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महत्त्वाकांक्षा और लोभ स्वाध्याय | Mahatvakansha aur lobh class 11

महत्त्वाकांक्षा और लोभ स्वाध्याय | Mahatvakansha aur lobh class 11 
महत्त्वाकांक्षा और लोभ स्वाध्याय | Mahatvakansha aur lobh class 11
आकलन [PAGE 53]
आकलन | Q 1 | Page 53
मछुवा-मछुवी की दिनचर्या 
solution
1) मछुवा दिनभर मछलियां पकड़ता
2) मछवी दिनभर दूसरा काम करती
3) तब कहीं रात में
4) वे वर्तमान में व्यस्त रहते हैं

आकलन | Q 2 | Page 53
मछुवा-मछुवी की कहानी का अंत 
solution
मछुवी ने पति की इच्छा के विरुद्ध एक बार फिर उसे मछली के
पास भेजा इस इच्छा के साथ कि सूर्य, चंद्र, मेघ आदि सभी मेरी
आज्ञा मानें। ऐसा सुनकर मछली रुष्ट हो गई और बोली जा-
जा, अपनी उसी झोपड़ी में रह। मछुवा और मछुवी दोनों फिर
अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में रहने लगे। यही कहानी का अंत हुआ।

आकलन | Q 3 | Page 53
लेखक द्वारा बताई गई मनुष्य स्वभाव की विशेषताएँ 
solution
1) वह अपने दोषो को छिपाकर दूसरों पर ही दोषरोपण करता है
2) यह निसंकोच कहता है कि मैंने किसी पर उपकार किया
3) दूसरों के कामों को महत्व न देकर अपने कामों को महत्व 
देता है

शब्द संपदा | Q 1 | Page 53
निम्नलिखित शब्दों के लिए उचित शब्द समूह का चयन कीजिए

SOLUTION

भक्ष्य

जो खाने के अयोग्य हो

अदृश्य

जो दिखाई नहीं देता ।

अजये

जिसे जीता न जा सके

शोषित

जिसका शोषण किया गया है

कृशकाय

जो बहुत दुबला-पतला हो ।

सर्वज्ञ

जो सब कुछ जानता हो

समदर्शी

जो सबको समान दृष्टि से देखता है।

मितभाषी

जो कम बोलता है




शब्द संपदा [Page 53]
शब्द संपदा | Q 1 | Page 53
अभक्ष्य - 
जो खाने के अयोग्य हो
जो खाया नहीं गया
solution
अभक्ष्य - जो खाने के अयोग्य हो

शब्द संपदा | Q 2 | Page 53
अदृश्य- 
जो दिखाई न दे
जो दिखाई नहीं देता
solution
अदृश्य - जो दिखाई नहीं देता

शब्द संपदा | Q 3 | Page 53
अजेय- 
जिसे जीता न जा सके
जिसे जीतना कठिन हो
solution
अजेय 

शब्द संपदा | Q 4 | Page 53
शोषित - 
जिसका शोषण किया गया ह
जो शोषण करता ह
solution
शोषित - जिसका शोषण किया गया है

शब्द संपदा | Q 5 | Page 53
कृशकाय - 
जिसका शरीर कुश (घास) के समान हो
जो बहुत दुबला-पतला हो
solution
कृशकाय - जो बहुत दुबला-पतला हो


शब्द संपदा | Q 6 | Page 53
सर्वज्ञ - 
जो सब कुछ जानता हो
जो सब जगह व्याप्त है
solution
सर्वज्ञ - जो सब कुछ जानता हो

शब्द संपदा | Q 7 | Page 53
समदर्शी - 
जो सबको समान दीखता है
जो सबको समान दृष्टि से देखता ह
solution
समदर्शी - जो सबको समान दृष्टि से देखता ह।


शब्द संपदा | Q 8 | Page 53
मितभाषी - 
जो कम बोलता है
जो मीठा बोलता है
solution
मितभाषी - जो कम बोलता है।

अभिव्यक्ति [PAGE 54]

अभिव्यक्ति | Q 1 | Page 54
अति से तो अमृत भी जहर न जाता है. इस कार पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
solution
अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। अर्थात अधिक बोलना अनेक अवसरों पर अहितकारी हो जाता है। यदि न कहने योग्य कोई बात मुँह से निकल जाए तो व्यर्थ ही झगड़े-फसाद की नौबत आ सकती है। 

इसी प्रकार अधिक चुप रहना, अन्याय होते देखकर भी विरोध न करना हितकर नहीं है। अधिक वर्षा होगी तो बाढ़ का प्रकोप, भूस्खलन जैसी आपदाएँ आ सकती हैं, परंतु यदि सूर्य का ताप बहुत अधिक होगा तो सूखा पड़ जाएगा। जल-स्रोत सूख जाएँगे और जीव-जंतुओं में त्राहि-त्राहि मच जाएगी। सारांश : अति का सर्वत्र त्याग करना चाहिए। 

प्रस्तुत परिच्छेद में यही दृष्टिगोचर होता है। मछुवे के कहने पर मछली ने उसे घर दिया। धन-दौलत, महल, राजकीय वैभव सभी कुछ दिया। पर जब मछुवी ने सूर्य, चंद्र, मेघ आदि सभी पर शासन करना चाहा तो मछली ने क्रुद्ध होकर सभी वरदान वापस ले लिए। मछुवे और मछुवी को अपनी पुरानी स्थिति में आना पड़ा। यदि मछुवी इस प्रकार अति लालच न करती तो महल छोड़कर फिर से झोंपड़ी में न रहना पड़ता। सच ही कहा गया है 'अति से तो अमृत भी जहर बन जाता है।'

अभिव्यक्ति | Q 2 | Page 54
महत्त्वाकांक्षाओं का कभी अंत नहीं होता', विषय पर अपने
विचार व्यक्त कीजिए।
solution
महत्त्वाकांक्षाओं का कभी अंत नहीं होता। एक के पूरा होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। इच्छा, कामना, लालसा ये सब महत्वाकांक्षा के ही पर्याय हैं। महत्वाकांक्षा मन की ऊँची उड़ान है। कुछ कर गुजरने की तीव्र अभिलाषा है। यह आकाश की तरह अनंत है। महत्वाकांक्षा ही है, जो एक औसत विद्यार्थी को कुशाग्र बनाती है। एक क्लर्क से अफसर, अध्यापक से लेक्चरर बनाती है। महत्वाकांक्षा व्यक्ति को निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है। मनुष्य के जीवन को एक दिशा देती है। 

विकास के लिए, आगे बढ़ने के लिए महत्त्वाकांक्षी होना उचित है। मनुष्य को महत्त्वाकांक्षी तो होना ही चाहिए कि किस प्रकार मैं नित्य आगे बढ़ता रहूँ। महत्वाकांक्षा मनुष्य को अपना लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अधिकाधिक प्रयास करने को प्रेरित करती है। परंतु सिक्के का दूसरा पहलू भी है। महत्त्वाकांक्षा उस समय बुरी है जब इसके कारण मनुष्य अधर्म, अनीति के मार्ग पर चलने लगता है। अधर्म के मार्ग पर चलकर किया जाने वाला प्रत्येक कार्य पतन की ओर ले जाता है।

पाठ पर आधारित लघुत्तरी प्रश्न | Q 1 | Page 54
प्रस्तुत निबंध में निहित मानवीय भावों से संबंधित विचार लिखिए।
solution
प्रस्तुत निबंध में अनेक मानवीय भावों का निरूपण किया गया है। जैसे - संतोष, उपकार, कृतज्ञता, दया आदि। मछुवा और गया है। जैसे संतोष, उपकार, कृतज्ञता, दया आदि। : मूवी अपने अभावग्रस्त जीवन में भी संतुष्ट थे। उनके मन में किसी भी प्रकार की लालसा नहीं थी। वे बड़े संतोषी थे। एक मछली के कहने पर परोपकारी मछली ने उसे पानी के छोटे-से गड्ढे से निकालकर नदी में पहुँचा दिया। मछुवे के मन में तनिक भी स्वार्थ नहीं था। मछुवे की पत्नी के कहने पर मछली ने उन्हें घर, धन-दौलत, महल, राजकीय वैभव सभी कुछ दिया। यह मछुवा दम्पति के प्रति मछली की दया और कृतज्ञता थी।

पाठ पर आधारित लघुत्तरी प्रश्न | Q 2 | Page 54
पाठ के आधार पर कृतघ्नता, असंतोष के संबंध में लेखक की धारणा लिखिए।
solution
कृतज्ञता एक दैवीय गुण है। जिसने हमें सहायता पहुँचाई हो, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए, उसका उपकार मानना चाहिए। बहुत-से लोग आवश्यकता के समय तो चिकनी-चुपड़ी बातें करके अपना काम निकाल लेते हैं परंतु काम निकल जाने के बाद मुँह फिरा लेते हैं। यह बहुत बड़ी कृतघ्नता है। कृतघ्न व्यक्ति । कभी सुखी नहीं रह सकता। जो उसकी मदद करते हैं, वह उन्हीं का बुरा सोचता है। यह एक चोरवृत्ति है। ऐसे लोग केवल स्वयं । के प्रति कृतज्ञ होते हैं। मानव का दूसरा बड़ा अवगुण है असंतोष। आज का मनुष्य संतुष्ट होना ही नहीं जानता। एक समय था मनुष्य। की जरूरतें अत्यंत सीमित थीं। जितना मिल जाता था, उसी में वह संतोष कर लेता था। परंतु आज जितना भी मिल जाए, वह कम ही लगता है। और अधिक पाने की चाह हमें प्राप्य वस्तुओं का भी आनंद नहीं लेने देती।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान [PAGE 54]

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 54
जानकारी दीजिए:
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी के निबंधों की प्रमुख विशेषताएँ 
solution
1) नाटकों जैसी रमणीयता।
2) कहानी जैसी मनोरंजकता और प्रासंगिकता।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 2 | Page 54
जानकारी दीजिए:
अन्य निबंधकारों के नाम
solution
(1) भारतेंदु हरिश्चंद्र
(2) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(3) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(4) बालकृष्ण भट्ट
(5) आचार्य प्रतापनारायण मिश्र
(6) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
(7) महादेवी वर्मा
(8) कन्हैयालाल मिश्र 'प्र

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 54
दी गई शब्द पहेली से प्रसिद्ध रचनाकारों के नाम ढूँढ़कर उनकी सूची तैयार कीजिए
solution
(1) महादेवी वर्मा
(2) प्रेमचंद
(3) कमलेश्वर
(4) प्रसाद
(5) निराला
(6) नीरज
(7) पंत
(8) रांगेय राघव
(9) सूर्यबाला
(10) मीरा
(11) सूरदास।


महत्त्वाकांक्षा और लोभ स्वाध्याय | Mahatvakansha aur Swthay

लेखक परिचय ःपदुमलाल बख्शी जी का जन्म २७ मई १8९4 को खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) में हुआ। बी.ए. के पश्चात आप साहित्य क्षेत्र में आए। आपके निबंध जीवन की सच्चाइयों को बड़ी सरलता से व्यक्त करते हैं। नाटकों-सी रमणीयता तथा कहानी-सी मनोरंजकता आपके निबंधों को विशिष्ट शैली प्रदान करती है। समसामयिक होते हुए भी निबंधों की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। बख्शी जी की मृत्यु १९७१ में हुई।
प्रमुख कृतियाँ ः ‘पंचपात्र’, ‘पदय् वन’, ‘कुछ’, ‘और कुछ’ (निबंध संग्रह), ‘कथा चक्र’ (उपन्यास), ‘हिंदी साहित्य विमर्श’ और ‘विश्व साहित्य’ (समीक्षात्मक ग्रंथ) आदि।
विधा परिचय ः ‘निबंध’ को गद्य की कसौटी कहा गया है। किसी विषय या वस्तु पर उसके स्वरूप, प्रकृति, गुण-दोष आदि की दृष्टि से लेखक की गद्यात्मक अभिव्यक्ति निबंध है। निबंध के लक्षणों में स्वच्छंदता, सरलता, आडंबरहीनता, घनिष्ठता और आत्मीयता के साथ लेखक के व्यक्तिगत, आत्मनिष्ठ दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्‌विवेदी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विद्यानिवास मिश्र आदि प्रमुख निबंधकार हैं। 
पाठ परिचय ः प्रस्तुत वैचारिक निबंध अति महत्त्वाकांक्षा के साथ असंतोष, अति लालसा, स्वयं को सर्वशक्तिमान बना लेने की उत्कट अभिलाषा तथा कृतघ्नता के दुष्परिणामों को इंगित करता है। प्राप्य के प्रति विरक्ति का भाव तथा अप्राप्य की लालसा हमेशा मानव मन को लोभ के जाल में फँसाती रहती है। मछुवा-मछुवी की कहानी के माध्यम से मानव मन की अनंत इच्छाओंकेपरिणामकारोचकचित्रणइसनिबंधमें किया गया है। यह निबंध विचार करने के लिए प्रवृत्त करता है ।  

महत्त्वाकांक्षा और लोभ स्वाध्याय | Mahatvakansha aur lobh

- पदुमलाल पुन्नालाल बख्
बड़ों में जो महत्त्वाकांक्षा होती है, उसी को जब हम क्षुद्रों में देखते हैं तो उसे हम लोभ कह देते हैं । उसी के संबंध में आज एक पुरानी कथा कहता हूँ।
एक था मछुवा, एक थी मछुवी। दोनों किसी झाड़ के नीचे एक टूटी-फूटी झोंपड़ी में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। मछुवा दिन भर मछलियाँ पकड़ता, मछुवी दिन भर दूसरा काम करती। तब कहीं रात में वे लोग खाने के लिए पाते। ग्रीष्म हो या वर्षा, शरद हो या वसंत, उनके लिए वही एक काम था, वही एक चिंता थी। वे भविष्य की बात नहीं सोचते थे क्योंकि वर्तमान में ही वे व्यस्त रहते थे। उन्हें न आशा थी, न कोई लालसा। 

आशा थी, न कोई लालसा। पर एक दिन एक घटना हो गई। मछुवा अा रहा था मछलियाँ पकड़ने। नदी के पास एक छोटा-सा गड्ढा था। उसमें कुछ पानी भरा था। उसी में एक कोने पर, लताओं में, एक छोटी-सी मछली फँस गई थी। वह स्वयं किसी तरह पानी में नहीं जा सकती थी । उसने मछुवे को देखा और पुकारकर कहा -‘‘मछुवे, मछुवे, जरा इधर तो आ।’’ मछुवा उसके पास जाकर बोला - ‘‘क्या है?’’ 
मछली ने कहा - ‘‘मैं छोटी मछली हूँ। अभी तैरना अच्छी तरह नहीं जानती। यहाँ आकर फँस गई हूँ। मुझको किसी तरह यहाँ से निकालकर पानी तक पहुँचा दे।’’ 

मछुवे ने नीचे उतरकर लता से उसको अलग कर दिया। मछली हँसती हुई पानी में तैरने लगी।कुछ दिनों के बाद उस मछली ने उसे फिर पुकारा - ‘‘मछुवे, मछुवे, इधर तो आ।’’ मछुवा उसके पास गया। मछली ने कहा - ‘‘सुनती हूँ, नदी में खूब पानी है। मुझे नदी में पहुँचा दे। मैं तो तेरी तरह चल नहीं सकती। तू कोई ऐसा उपाय कर कि मैं नदी तक पहुँच जाऊँ।’’
यह कौन बड़ी बात है।’’ मछुवे ने यह कहकर एक बर्तन निकाला और उसमें खूब पानी भर दिया। फिर उसने उसी में उस मछली को रखकर नदी तक पहुँचा दिया । मछली नदी में सुरक्षित पहुँच गई और आनंद से तैरने लगी। कुछ दिनों के बाद उस मछली ने मछुवे को पुकारकर कहा - ‘‘मछुवे, तू रोज यहाँ आकर एक घंटा बैठा कर। तेरे आने से मेरा मन बहल जाता है।’’ मछुवे ने कहा - ‘‘अच्छा।’’

उस दिन से वह रोज वहीं आकर आधा घंटा बैठा करता । कभी-कभी वह आटे की गोलियाँ बनाकर ले जाता। मछली उन्हें खाकर उसपर और भी प्रसन्न होती। एक दिन मछुवी ने पूछा - ‘‘तुम रोज उसी एक घाट पर क्यों जाते हो?’’ मछुवे ने उसको उस छोटी मछली की कथा सुनाई। मछुवी सुनकर चकित हो गई । उसने मछुवे से कहा - ‘‘तुम बड़े निर्बुद्‌धि हो ! वह क्या साधारण मछली है! वह तो कोई देवी होगी, मछली के रूप में रहती है । जाओ, उससे कुछ माँगो। वह जरूर तुम्हारी इच्छा पूरी करेगी।’’

 मछुवा नदी के तट पर पहुँचा । उसने मछली को पुकारकर कहा - ‘‘मछली, मछली, इधर तो आ।’’ मछली आ गई। उसने पूछा - ‘‘क्या है?’’ मछुवे ने कहा - ‘‘हम लोगों के लिए क्या तू एक अच्छा घर नहीं बनवा देगी?’’ मछली - ‘‘अच्छा जा! तेरे लिए एक घर बन गया। तेरी मछुवी घर में बैठी है।’’ मछुवे ने आकर देखा कि सचमुच उसका एक अच्छा घर बन गया है। कुछ दिनों के बाद मछुवी ने कहा - ‘‘सिर्फ घर होने से क्या हुआ? खाने-पीने की तो तकलीफ है। जाओ, मछली से कुछ धन माँगो।’’ मछुवा फिर नदी तट पर गया । 

उसने मछली को पुकारकर कहा -‘‘मछली, मछली ! इधर तो आ।’’ मछली ने आकर पूछा - ‘‘क्या है?’’ मछुवे ने कहा -‘‘सुन तो, क्या तू हमें धन देगी?’’ मछली ने कहा - ‘‘जा, तेरे घर में धन हो गया।’’ मछुवे ने आकर देखा कि सचमुच उसके घर में धन हो गया है। कुछ दिनों के बाद मछुवी ने कहा - ‘‘इतने धन से क्या होगा? हमें तो राजकीय वैभव चाहिए। राजा की तरह एक महल हो, उसमें बाग हो, नौकर-चाकर हो और राजकीय शक्ति हो। जाओ, मछली से यही माँगो।’’ मछुवी की यह बात सुनकर मछुवा कुछ हिचकिचाया । उसने कहा - ‘‘जो है, वही बहुत है।’’ परंतु मछुवी ने उसकी बात न सुनी। उसने स्वयं मछली की दिव्य शक्ति देख ली थी । यही नहीं, एक बार जब वह मछली को आटे की गोलियाँ खिला रही थी, तब मछली से उसे आश्वासन भी मिल गया था; इसी से उसने मछुवे को हठपूर्वक भेजा। 

मछुवा कुछ डरता हुआ मछली के पास पहँुचा। उसने मछली को पुकारा और धीरे से कहा - ‘‘क्या तू मछुवी को रानी बना देगी?’’ मछली ने कहा - ‘‘अच्छा जा, तेरी मछुवी रानी बनकर महल में अभी घूम रही है।’’ मछुवे ने आकर देखा कि सचमुच उसके घर में राजकीय वैभव हो गया है। उसकी मछुवी रानी होकर बैठी है। कुछ दिनों के बाद मछुवी ने फिर कहा - ‘‘अगर सूर्य, चंद्र, मेघ आदि सभी मेरी आज्ञा मानते तो कैसा होता ?’’ उसने पुन: मछुवे को उसकी इच्छा के विरुद्ध मछली के पास भेजा। मछुवे की बात सुनकर मछली रुष्ट होकर बोली - ‘‘जा-जा, अपनी उसी झोंपड़ी में रह।’’

 मछुवा और मछुवी दोनों फिर अपनी उसी टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहने लगे। यहीं कहानी का अंत हो जाता है। कहानी पुरानी है और घटना भी झूठी है। उसकी एक भी बात सच नहीं है पर इसमें हम लोगों के मनोरथों की सच्ची कथा है। आकांक्षाओं का कब अंत हुआ है? इच्छाओं की क्या कोई सीमा है? पर मछुवे के भाग्य परिवर्तन पर कौन उसके साथ सहानुभूति प्रकट करेगा ? सभी यह कहेंगे कि यह तो उसका ही दोष था। उसकी स्त्री को संतोष ही नहीं था। यदि उसे संतोष हो जाता तो उसकी यह दुर्गति क्यों होती ? मछुवे ने भी शायद यही कहकर अपनी स्त्री को झिड़का होगा परंतु मैं स्त्री को निर्दोष समझतहूँ। 

मेरी समझ में दोष मछली का ही है । यदि वह पहले ही मछुवे को कह देती कि मुझमें सब कुछ करने की शक्ति नहीं है तो मछुवे की स्त्री उससे ऐसी याचना ही क्यों करती? यदि मछुवे की स्त्री में संतोष ही रहता तो वह पहली बार ही अपने पति को माँगने के लिए क्यों कहती ? मछली ने पहले तो अपने वरदानों से यह बात प्रकट कर दी कि मानो वह सब कुछ कर सकती है किंतु जब मछुवे की स्त्री ने कुछ ऐसी याचना की जो उसकी शक्ति के बाहर थी, तब वह एकदम क्रुद्ध होकर अभिशाप ही दे बैठी। उसने मछुवे के उपकार का भी विचार नहीं किया। वह यह भूल गई कि मछुवे ने यदि उस समय उसपर दया न की होती तो शायद उसका अस्तित्व ही न रहता। उसने मछुवे से यह क्यों नहीं कहा -‘‘जा भैया, मैं तेरे लिए बहुत कर चुकी। अब मैं कुछ नहीं कर सकती। अपनी रानी को समझा देना।’’ हम सभी लोग अपने जीवन में यही भूल करते हैं। हम लोग अपने दोषों को छिपाकर दूसरों पर ही दोषारोपण करते हैं। हम दूसरों के कामों को महत्ता न देकर अपने ही कामों को महत्त्व देते हैं। हम यह निस्संकोच कहते हैं कि हमने किसी पर यह उपकार किया पर हम यह नहीं बतलाते कि उसने हमारी क्या सेवा की, उससे हमें क्या लाभ हुआ। सच तो यह है कि उपकार और सेवा एक बात है और यह लेन-देन कुछ दूसरी बात है। मछुवे की स्त्री ने जो कुछ किया, वह ठीक ही किया था। 

सभी लोग जानते हैं कि जब तक कोई वस्तु अप्राप्य रहती है तभी तक उसके लिए बड़ी व्यग्रता रहती है। ज्योंहीवह प्राप्त हो जाती है त्योंही हमें उससे विरक्ति हो जाती है और हम किसी दूसरी वस्तु के लिए व्यग्र हो जाते हैं। अतएव मछुवे की स्त्री ने जो कुछ किया, वह मनुष्य स्वभाव के अनुकूल किया परंतु मछली ने जो कुछ किया, वह अपने दैवी स्वभाव के विरुद्ध किया। उसे तो मछुवे पर दया करनी चाहिए थी । उसे उसके उपकार को न भूलना था। राजा बनने के बाद उसे एकदम भिक्षुक बना देना कभी उचित नहीं कहा जा सकता। यदि मैं मछुवा होता तो उससे कहता - देवी, मैंने जब तुम्हें जल में छोड़ा था तब मैंने यह नहीं सोचा था कि तुम मुझे राजा बनाओगी । मैंने तो वह काम निस्वार्थभाव से ही किया था। 

अपनी स्त्री के कहने पर तुमको देवी समझकर मैंने याचना की। तुमने भी याचना स्वीकृत की पर तुमने क्या मेरी स्त्री के हृदय में अभिलाषा नहीं पैदा कर दी? क्या तुमने उसके मन में यह आशा नहीं जगा दी कि तुम उसके लिए सब कुछ कर सकती हो? वह तो पहले अपनी स्थिति से संतुष्ट थी । तुम्हारे ही कारण उसके मन में और कई अभिलाषाएँ उत्पन्न हुईं। तुमने उनको भी पूर्ण किया । उसे तुम्हारी शक्ति पर विश्वास हो गया । तभी तो उसने ऐसी इच्छा प्रकट कर दी जो तुम्हारे लिए असंभव थी । तुमने जो कुछ दिया, उस सबको इसी एक अपराध के कारण कैसे ले लिया? तुम्हारे वरदान का अंत अभिशाप में कैसे परिणत हो गया ? तुम्हें मेरी अौर मेरी स्थिति पर विचार कर काम करना चाहिए था। तुम भले ही देवी हो पर तुममें त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, उपकार की भावना नहीं है, क्षमा नहीं है, दया नहीं है। 

Maharashtra Board Class 11 Hindi Yuvakbharati Solutions Chapter 10 महत्त्वाकांक्षा और लोभ 



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