वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ] वृंद के दोहे स्वाध्याय

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

कारण लिखिए :
1) सरस्वती के भंडार को अपूर्व कहा गया है :
SOLUTION
सरस्वती के भंडार को जैसे-जैसे खर्च किया जाता रहता है, वैसे-वैसे वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचता रहता है अर्थात उसमें वृद्धि होती रहती है। इसलिए सरस्वती के भंडार को अपूर्व कहा गया है।

2) व्यापार में दूसरी बार छल-कपट करना असंभव होता है :-
SOLUTION
व्यापार में पहली बार किया गया छल-कपट सामने वाले पक्ष को समझते देर नहीं लगती। दूसरी बार वह सतर्क हो जाता है। इसलिए व्यापार में दूसरी बार छल-कपट करना असंभव होता है।

सहसंबंध जोड़िए:-

आकलन | Q 2 | Page 29
SOLUTION
(१) बैठो देवल सिखर पर, वायरस गरुड़ न होइ।
(२) काग निबौरी लेत

निम्नलिखित शब्दों के लिए विलोम शब्द लिखिए :

शब्द संपदा | Q 1 | Page 29
1) आदर -
SOLUTION
आदर x अनादर

2) अस्त -
SOLUTION
अस्त X उदय

3) कपूत-
SOLUTION
कपूत X सपूत

4) पतन-
SOLUTION
पतन X उत्थान

अभिव्यक्ति 

अभिव्यक्ति | Q 1 | Page 29
1) ‘चादर देखकर पैर फैलाना बुद्‌धिमानी कहलाती है’, इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कीजिए ।
SOLUTION
चादर देखकर पैर फैलाने का अर्थ है, जितनी अपनी क्षमता हो उतने में ही काम चलाना। यह अर्थशास्त्र का साधारण नियम है। सामान्य व्यक्तियों से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी इस नियम का पालन करती हैं। जो लोग इस नियम के आधार पर अपना कार्य करते हैं, उनके काम सुचारु रूप से चलते हैं। जो लोग बिना सोचे-विचारे किसी काम की शुरुआत कर देते हैं और अपनी क्षमता का ध्यान नहीं रखते, उनके सामने आगे चलकर आर्थिक संकट उपस्थित हो जाता है। इसके कारण काम ठप हो जाता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि अपनी क्षमता का अंदाज लगाकर ही कोई कार्य शुरू किया जाए। इससे कार्य आसानी से पूरा हो जाता है। चादर देखकर पैर फैलाने में ही बुद्धिमानी होती है।

2) ज्ञान की पूँजी बनाना चाहिए', इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
SOLUTION
ज्ञान मनुष्य की अमूल्य पूँजी है। बचपन से मृत्यु तक मनुष्य विभिन्न स्रोतों से ज्ञान की प्राप्ति करता रहता है। बचपन में उसे अपने माता-पिता, अपने शिक्षकों, गुरुजनों तथा मिलने-जुलने वालों से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान का भंडार अथाह है। कुछ ज्ञान हमें स्वाभाविक रूप से मिल जाता है, पर कुछ के लिए हमें स्वयं प्रयास करना पड़ता है। ज्ञान किसी एक की धरोहर नहीं है। ज्ञान हमारे चारों तरफ बिखरा पड़ा है। उसे देखने की दृष्टि की जरूरत होती है। संतों, महात्माओं तथा मनुष्यों के व्याख्या, हितोपदेशों, नीतिकथाओं, बोधकथाओं तथा विभिन्न धर्मों के महान ग्रंथों में ज्ञान का भंडार है। हर मनुष्य अपनी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार अपने ज्ञान की पूँजी में वृद्धि करता रहता है। भगवान महावीर, बुद्ध तथा महात्मा गांधी जैसे महापुरुष अपने ज्ञान की पूँजी तथा अपने कार्यों के बल पर जनसामान्य के पूज्य बन गए हैं। इसलिए मनुष्य को सदा अपने ज्ञान की पूँजी बढ़ाते रहना चाहिए।

3) जीवन के अनुभवों और वास्तविकता से परिचित कराने वाले वृंद जी के दोहों का रसास्वादन कीजिए।
SOLUTION
कवि वृंद ने अपने लोकप्रिय छंद दोहों के माध्यम से सीधे-सादे ढंग से जीवन के अनुभवों से परिचित कराया है तथा जीवन का वास्तविक मार्ग दिखाया है।
कवि व्यावहारिक ज्ञान देते हुए कहते हैं कि मनुष्य को अपनी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखकर किसी काम की शुरुआत करनी चाहिए। तभी सफलता मिल सकती है। इसी तरह व्यापार करने वालों को सचेत करते हुए उन्होंने कहा है कि वे व्यापार में छल-कपट का सहारा न लें। इससे वे अपना ही नुकसान करेंगे। वे कहते हैं कि किसी का सहारा मिलने के भरोसे मनुष्य को हाथ पर हाथ धरकर निष्क्रिय नहीं बैठ जाना चाहिए। मनुष्य को अपना काम तो करते ही रहना चाहिए। इसी तरह से वे कुटिल व्यक्तियों के मुँह न लगने की उपयोगी सलाह देते हैं, वह उस समय आपको कुछ ऐसा भला-बुरा सुना सकता है, जो आपको प्रिय न लगे।

अपने आप को बड़ा बताने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। जिसमें बड़प्पन के गुण होते हैं उसी को लोग बड़ा मनुष्य मानते हैं। गुणों के बारे में उनका कहना है कि जिसके अंदर जैसा गुण होता है, उसे वैसा ही लाभ मिलता है। कोयल को मधुर आम मिलता है और कौवे को कड़वी निबौली। बिना सोचे विचार किया गया कोई काम अपने लिए ही नुकसानदेह होता है। वे कहते हैं कि बच्चे के अच्छे-बुरे होने के लक्षण पालने में ही दिखाई दे जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे किसी पौधे के पत्तों को देखकर उसकी प्रगति का पता चल जाता है।

कवि एक अनूठी बात बताते हुए कहते हैं कि संसार की किसी भी चीज को खर्च करने पर उसमें कमी आती है, पर ज्ञान एक ऐसी चीज है, जिसके भंडार को जितना खर्च किया जाए वह उतना ही बढ़ता जाता है। उसकी एक विशेषता यह भी है कि यदि उसे खर्च न किया जाए तो वह नष्ट होता जाता है।
कवि ने विविध प्रतीकों की उपमाओं के द्वारा अपनी बात को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। दोहों का प्रसाद गुण उनकी बात को स्पष्ट करने में सहायक होता है।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 30
4) वृंद जी की प्रमुख रचनाएँ –
SOLUTION
वृंद जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं : वृंद सतसई, समेत शिखर छंद, भाव पंचाशिका, पवन पचीसी, हितोपदेश, यमक सतसई, वचनिका तथा सत्य स्वरूप आदि।

5) दोहा छंद की विशेषता -
SOLUTION
दोहा अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसके चार चरण होते हैं। दोहे के प्रथम और तृतीय (विषम) चरण में १३ - १३ मात्राएँ होती हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ (सम) चरणों में ११ - ११ मात्राएँ होती हैं। दोहे के प्रत्येक चरण के अंत में लघु वर्ण आता है।
जैसे –

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात ।
ज्यौं खरचै त्यौं-त्यौं बढ़ै, बिन खरचे घटि जात ।।

नैना देत बताय सब, हिय को हेत-अहेत ।
जैसे निरमल आरसी, भली बुरी कहि देत ।।

अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिए दौर ।
तेते पाँव पसारिए, जेती लाँबी सौर ।।

फेर न ह्‌वै हैं कपट सों, जो कीजै ब्यौपार ।
जैसे हाँड़ी काठ की, चढ़ै न दूजी बार ।।

ऊँचे बैठे ना लहैं, गुन बिन बड़पन कोइ ।
बैठो देवल सिखर पर, वायस गरुड़ न होइ ।।

उद्यम कबहुँ न छाँड़िए, पर आसा के मोद ।
गागरि कैसे फोरिए, उनयो देखि पयोद ।।

कछु कहि नीच न छेड़िए, भलो न वाको संग ।
पाथर डारै कीच मैं, उछरि बिगारै अंग ।।

जो पावै अति उच्च पद, ताको पतन निदान ।
ज्यौं तपि-तपि मध्याह्न लौं, अस्त होतु है भान ।।

जो जाको गुन जानही, सो तिहि आदर देत ।
कोकिल अंबहि लेत है, काग निबौरी लेत ।।

आप अकारज आपनो, करत कुबुध के साथ ।
पाय कुल्हाड़ी आपने, मारत मूरख हाथ ।।

कुल कपूत जान्यो परै, लखि सुभ लच्छन गात ।
होनहार बिरवान के, होत चीकने पात ।।
- (‘वंृद सतसई’ संग्रह से)

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

कवि परिचय -

  1.  माना जाता है कि कवि वृंद जी का जन्म १६4३ को मथुरा में हुआ । रीतिकालीन परंपरा के अंतर्गत आपका नाम आदर के साथ लिया जाता है । 
  2. आपका पूरा नाम ‘वृंदावनदास’ है । आपकी रचनाएँ रीतिबद्ध परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं । आपने काव्य के विविध प्रकारों में रचनाएँ रची हैं । 
  3. ‘बारहमासा’ में बारह महीनों का सुंदर चित्रण किया है तो ‘यमक सतसई’ में विविध प्रकार से यमक अलंकार का स्वरूप स्पष्ट किया है । 
  4. आपके नीतिपरक दोहे जनसाधारण में बहुत प्रसिद्ध हैं और लोकव्यवहार में अनुकरणीय हैं । आपकी भाषा सहज-सुंदर तथा लोकभाषा से जुड़ी हुई है । 
  5. आपकी भाषा में ब्रज तथा अवधी भाषा के शब्दों की बहुलता देखी जाती है । आपके द्‌वारा दिए गए दृष्टांत आपकी भाषा के साथ-साथ भाव और कथ्यको भी प्रभावोत्पादक बना देते हैं । 
  6. आपका निधन १७२३ में हुआ ।

प्रमुख कृतियाँ 

  1. वृंद सतसई’, ‘समेत शिखर छंद’, ‘भाव पंचाशिका’, ‘पवन पचीसी’, ‘हितोपदेश संधि’, ‘यमक सतसई’ ‘वचनिका’, ‘सत्यस्वरूप’ आदि ।
  2. विधा परिचय ः रीतिकालीन काव्य परंपरा में दोहा छंद का अपना विशिष्ट स्थान है । दोहा छंद कई कवियों का प्रिय छंद रहा है । 
  3. दोहा अद्‌र्धसम मात्रिक छंद है । दोहे के प्रत्येक चरण के अंत में लघुवर्ण आता है । इसके चार चरण होते हैं ।
  4. प्रथम और तृतीय चरण में १३-१३ मात्राएँ होती हैं तथा द्‌वितीय और चतुर्थ चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं ।

पाठ परिचय -

  1. प्रस्तुत दोहों में कवि वृंद ने कई नीतिपरक बातों की सीख दी है । विद्या रूपी धन की विशेषता यह होती है कि वह खर्चकरने पर भी बढ़ता जाता है । 
  2. आँखें मन की सच-झूठ बातें बता देती हैं । जितनी चादर हो, मनुष्य को उतने ही पाँव फैलाने चाहिए । 
  3. व्यवहार में कपट को स्थान नहीं देना चाहिए । बिना गुणों के मनुष्य को बड़प्पन नहीं मिलता । दुष्ट व्यक्ति से उलझने पर कीचड़ हमपर ही उड़ता है ।
  4.  संसार में सद्‌गुणों के कारण ही व्यक्ति को आदर प्राप्त होता है । 
  5. कवि वृंद के दोहे पाठकों को व्यावहारिक अनुभवों से परिचित कराते हैं, जीवन का सच्चा मार्ग दिखाते हैं ।

वृंद के दोहे कविता 12वी हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ ]

  1. सरसुति = सरस्वती, 
  2. विद्या की देवी करतब = कार्य
  3. सौर = चादर 
  4. काठ = लकड़ी
  5. लहैं = लेना 
  6. वायस = कौआ
  7. उद्‌यम = प्रयत्न 
  8. पयोद = बादल
  9. पाथर = पत्थर 
  10. तिहि = उसे
  11. अंबहि = आम 
  12. निबौरी = नीम का फल

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