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उड़ चल, हारिल कविता 11th हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ रसास्वादन ]

उड़ चल, हारिल कविता 11th हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ रसास्वादन ]

उड़ चल हारिल लिए हाथ में, यही अकेला ओछा तिनका 
उषा जाग उठी प्राची में कैसी बाट, भरोसा किनका !
शक्‍ति रहे तेरे हाथों में, छूट न जाय यह चाह सृजन की
शक्‍ति रहे तेरे हाथों में, रुक न जाय यह गति जीवन की !
ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर, बढ़ा चीर चल दिग्मंडल
अनथक पंखों की चोटों से, नभ में एक मचा दे हलचल !
तिनका तेरे हाथों में है, अमर एक रचना का साधन
तिनका तेरे पंजे में है, विधना के प्राणों का स्‍पंदन !
काँप न, यद्यपि दसों दिशा में, तुझे शून्य नभ घेर रहा है
रुक न यद्यपि उपहास जगत का, तुझको पथ से हेर रहा है !
तू मिट्टी था, किंतु आज मिट्टी को तूने बाँध लिया है
तू था सृष्‍टि किंतु स्रष्‍टा का, गुर तूने पहचान लिया है !
मिट्टी निश्चय है यथार्थ, पर क्‍या जीवन केवल मिट्टी है ?
तू मिट्टी, पर मिट्टी, से उठने की इच्छा किसने दी है ?
आज उसी ऊर्ध्वंग ज्‍वाल का, तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज दंड बना यह तिनका, सूने पथ का एक सहारा !
मिट्टी से जो छीन लिया है, वह तज देना धर्म नहीं है
जीवन साधन की अवहेला, कर्मवीर का कर्म नहीं है !
तिनका पथ की धूल स्‍वयंतू, है अनंत की पावन धूली
किंतु आज तूने नभ पथ में, क्षण में बद्ध अमरता छू ली !
उषा जाग उठी प्राची में, आवाहन यह नूतन दिन का 
उड़ चल हारिल लिए हाथ में, एक अकेला पावन तिनक

उड़ चल, हारिल कविता 11th हिंदी [ स्वाध्याय भावार्थ रसास्वादन 



  1. जन्म ः १९११, देवरिया (उ.प्र.)
  2. मृत्यु ः १९७8, दिल्‍ली

परिचय ः सच्चिदानंद हीरानंद वात्‍स्‍यायन ‘अज्ञेय’ जी आधुनिक हिंदी साहित्‍य के जाज्‍वल्‍यमान नक्षत्र आैर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । आपने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, निबंध, संस्‍मरण, नाटक सभी विधाओं में सफलतापूर्वक अपनी कलम चलाई है । आपने अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अनूदित भी किया है । 

प्रमुख कृतियाँ ः ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘आँगन के पारद्वार’, ‘सागर मुद्रा’ (कविता 
संग्रह), ‘शेखरः एक जीवनी’(दो भागों में), ‘नदी के द्वीप’ (उपन्यास), ‘एक बूँद सहसा उछली’, ‘अरे ! यायावर रहेगा याद’ (यात्रावृत्‍तांत), ‘सबरंग’, त्रिशंकु’ (निबंध संग्रह), ‘तार सप्तक’, ‘दूसरा सप्तक’ और ‘तीसरा सप्तक’ (संपादन) आदि ।

पद्‌य संबंधी
प्रस्‍तुत कविता में ‘अज्ञेय’ जी ने हारिल पक्षी के माध्यम से देश के नवयुवकों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है । कवि का कहना है कि जीवन पथ मंे अनेक कठिनाइयाँ आऍंगी किंतु उनसे घबराना नहीं है । जीवन-जगत के आह्वान को स्‍वीकार करके ‘फीनिक्‍स’ पक्षी की भाँति आसमान की ऊॅंचाइयों तक पहुँचना ही हमारा लक्ष्य होना 
चाहिए

  1. हारिल पुं.सं.(दे.) = हरियाल (एक पक्षी) 
  2.  (महाराष्‍ट्र का राज्‍यपक्षी)
  3. ओछा वि.(दे.) = तुच्छ, छोटा
  4. दिग्मंडल पुं.सं.(सं) = दिशाओं का समूह
  5. विधना पुं.(सं.) = होनहार
  6. उपहास पुं.सं.(सं.) = हँसी, दिल्‍लगी
  7. गुर पुं.सं.(दे.) = कार्य साधने की युक्‍ति, कायदा
  8. ऊर्ध्वंग पुं.सं.(सं.) = शरीर के ऊपर का भाग
  9. दुर्निवार वि.(सं.) = जिसका निवारण करना कठिन हो ।
  10. हरकारा पुं. सं. (फा.) = डाकिया, संदेशवाहक

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