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मेरा भला करने वालों से बचाए स्वाध्याय | Mera bhala karne walo se bachaye swadhyay

मेरा भला करने वालों से बचाए स्वाध्याय  | Mera bhala karne walo se bachaye swadhyay

मेरा भला करने वालों से बचाए स्वाध्याय  | Mera bhala karne walo se bachaye swadhyay

आकलन [PAGE 17]

आकलन | Q 1.1 | Page 17
लिखिए:
लेखक की चिंता करने वाले
Solution :
लड़कि यों के झुंड
क्रेडि ट कार्ड वाला
वाटर फिल्टर लगाने वाला
चार टिकियों में एक मुफ्त साबुन की टिकिया देने वाला

आकलन | Q 1.2 | Page 17
लिखिए:
लेखक का योग के प्रति मोह भंग हो गया है
Solution :
एक दिन लेखक योग वालों के दायरे में शामिल हो गए और उन्हें पता चला कि आपको ठहाका लगाने का आधार एक-दूसरे को चुटकुला सुनना है। जब लेखक को योग वालों के ठहाका लगाने का राज समझ में आ गया, तब उनका योग के प्रति मोह भंग हो गया।

आकलन | Q 2 | Page 17
कारण लिखिए
लेखक की परेशानी के कारण
Solution :
समाचार परता के साथ आने वाले ढेर सारे कागज
पौफलेट पढ़ने बैठने पर अखबार पढ़ने का वक़्त न बचना

उपसर्गयुक्त शब्द लिखिए:

शब्द संपदा [PAGES 17 - 18]

शब्द संपदा | Q 1.1 | Page 17
प्र
Solution :
प्र
• प्रगति
• प्रयत्न
• प्रक्रिया

शब्द संपदा | Q 1.2 | Page 17
Solution :
• अचल
• अनाथ
• अमर

शब्द संपदा | Q 1.3 | Page 17
वि
Solution :
• विजय
• विज्ञानं
• विशेष

शब्द संपदा | Q 1.4 | Page 17
नि
Solution :
नि
• निडर
• नियम
• निरादार


प्रत्यययुक्त शब्द लिखिए

शब्द संपदा | Q 2.1 | Page 18
(१) ____________
(२) ____________
(३) ____________
Solution :
(१) भक्ति
(२) उपस्तिथ
(३) प्रगति

शब्द संपदा | Q 2.2 | Page 18
ता
(१) ____________
(२) ____________
(३) ____________
Solution :
(१) साहित्यिक
(२) धार्मिक
(३) सामाजिक

शब्द संपदा | Q 2.3 | Page 18
ता
(१) ____________
(२) ____________
(३) ____________
Solution :
(१) महानता
(२) मानवता
(३) प्रभुता

शब्द संपदा | Q 2.4 | Page 18
ईय
(१) ____________
(२) ____________
(३) ____________
Solution :
(१) भारतीय
(२) स्वर्गीय
(३) शासकीय

अभिव्यक्ति [PAGE 18]

अभिव्यक्ति | Q 1 | Page 18
मुफ्त में मिलने वाली चीजों के प्रति लोगों की मानसिकतास्पष्ट कीजिए।
Solution :
ग्राहक कोई सामान तभी खरीदता है, जब उसे उसकी आवश्यकता होती है। पर कभी-कभी आवश्यकता न होने पर भी किसी कारण से वह सामान खरीद लेता है। इस कारण में प्रमुख है।
उसे कोई-न-कोई लालच दिखाकर सामान खरीदने के लिए प्रेरित किया जाना। इनमें मुफ्त सामान देना, कम कीमत या आधी कीमत में सामान देने का लालच होता है।

इस प्रकार के मुफ्त सामान बिक्री केंद्रों में ग्राहकों की भारी भीड देखी जाती है। ऐसे बिक्री केंद्रों से लोग मुफ्त सामान के आकर्षण में अनावश्यक सामान भी खरीद लाते हैं। व्यापार का नियम है, घाटे में कोई सीमा न करना। व्यापारी सामान में लगी लागत और अपना नाम लेकर ही चीज बेचता है। कुछ ग्राहकों को इस बात की जानकारी भी होती है कि व्यापारी ग्राहकों को मुफ्त में दिए जाने वाले सामान की कीमत किसी-न- किसी तरीके से निकाल ही लेता है। फिर भी लोग मुफ्त की चीजों को लेने का लालच संवरण नहीं कर पाते और उसका लाभ लेने पहुँच ही जाते हैं। इसलिए इस तरह के विक्री केंद्रों में ग्राहकों की भारी भीड़ देखी जाती है।

पाठ पर आधारित लघूत्तरी प्रश्न [PAGE 18]

पाठ पर आधारित लघूत्तरी प्रश्न | Q 2 | Page 18
अखबार के दफ्तर से आए दो युवकों से मिले लेखक केअनुभव को अपने शब्दों में लिखिए ।
Solution :
एक दिन लेखक के पास दो युवक आते हैं। वे अपने आप को अखबार के दफ्तर से आया हुआ बताते है। वे लेखक से कहते है कि वे फिल्में दिखाते हैं और उन पर उनकी राय के लिए उन्हें बुलाएँगे। लेखक को उनकी बात सुनकर अच्छा लगता है। उनकी सहमति पाकर दोनों युवक अपना काम शुरू कर देते हैं। इस बीच लेखक को किसी काम में लगा हुआ देखकर वे उनके सामने हस्ताक्षर के लिए एक कागज रख देते हैं। वे उनसे कहते हैं कि कागज में लिखी बातों को पढ़ने में केवल समय की बर्बादी होगी। इसलिए वे बस हस्ताक्षर कर दें। लेखक उनकी कही गई बातों पर विश्वास करके कागज पर हस्ताक्षर कर देते हैं। बाद में वे अखबार के दफ्तर से बुलावा आने की राह देखते रहते हैं। बुलावा तो नहीं आता, पर एक दिन उन्हें एक विदेशी बैंक का क्रेडिट कार्ड मिलता है। खोजबीन करने पर उन्हें पता चलता है कि उन्होंने जिस कागज पर हस्ताक्षर किया था, वह उस विदेशी बँक के क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन पत्र था। अखबार के आफिस से आए युवकों का इस विदेशी बैंक से काँट्रैक्ट था। लेखक को बिना कागज पढ़े उस पर हस्ताक्षर करने की अपनी गलती का अहसास होता है।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान [PAGE 18]

जानकारी दीजिए:

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 18
राजेंद्र सहगल जी की साहित्यिक कृतियाँ।
Solution :
(1) हिंदी उपन्यास, तीन दशक (शोध प्रबंध)
(2) असत्य की तलाश, धर्म बिका बाजार में (व्यंग्य संग्रह)

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 2 | Page 18
अन्य व्यंग्य रचनाकारों के नाम।
Solution :
हिंदी के अन्य व्यंग्य रचनाकारों के नाम इस प्रकार है:
(1) श्रीलाल शुक्ल 
(2) हरिशंकर परसाई 
(3) के. पी. सक्सेना
(4) रवींद्रनाथ त्यागी 
(5) शरद जोशी 
(6) शंकर पुणतांबेकर।

निम्नलिखित रस के उदाहरण दीजिए:

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 18
वीर
Solution :
वीर रस : वीर रस के उदाहरण निम्नलिखित हैं :
(1) दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।
(2) चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटी गर्जा अरु धावा।।
अति विशाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेश कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि-गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिनहि निपाति ताहिसन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरछा आई ।।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 2 | Page 18
करुण
Solution :
करुण रस:
(1) अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।
(2) वह आता -
दो-ट्रक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने का
मुँह फटी झोली फैलाता।
(3) प्रियपति! वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है,
दुख, जल निधि डूबी का सहारा कहाँ है!
लख मुख जिसका में आज जी सकी हूँ,
वह हृदय हमारा नयनतारा कहाँ है।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 3 | Page 18
भयानक
Solution :
भयानक रस:
(1) उधर गरजती सिंधु लहरिया ।
कुटिल काल के जालों-सी।
चली आ रही फेन उगलती
फन फैलाए व्यालों-सी ।
(2) हाट-बाट, कोट-ओट अटनि अगार पौरि।
खौरि-खौरि दौरि-दौरि दीन्ही अति आगि है।
आरत-पुकारत सम्हारत न कोऊ काहू
व्याकुल जहाँ सो तहाँ लोग चले भागी हैं।
बालधी फिरावें, बार-बार झुरावे, झरे।
बुंदिया-सी, लंक पिलाय पागि-पागि है।
तुलसी विलोकि अकुलानि जातुधानी कहें,
चित्रहू के कपि से निसाचर न लागि हैं।

मेरा भला करने वालों से बचाए | Mera bhala karne walo se bachaye 

- डॉ. राजेंद्र सहगल
लेखक परिचय ः राजेंद्र सहगल जी का जन्म २4 अगस्त १९5३ को हुआ । आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए., पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की । आप बैंक में उपप्रबंधक के रूप में कार्यरत रहें । आप आकाशवाणी से विभिन्न विषयों पर वार्ताओं का प्रसारण करते हैं तथा सामयिक महत्त्व के विषयों पर फीचर लेखन भी करते हैं । स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में आपके लगभग पचास व्यंग्य लेख प्रकाशित हुए हैं । 

प्रमुख कृतियाँ ः ‘हिंदी उपन्यास’, ‘तीन दशक’ (शोध प्रबंध), ‘असत्य की तलाश’, ‘धर्मबिका बाजार में’ (व्यंग्य-संग्रह) 

विधा परिचय ः हिंदी गदय की ् विभिन्न विधाओं में ‘व्यंग्य’ का प्रमुख स्थान है। अतिशयोक्ति, विडंबना, विसंगतियाँ, अन्योक्ति तथा आक्रोश प्रदर्शन व्यंग्य के प्रमुख उपादान हैं। व्यक्ति का दोमुँहापन, दोगलापन, पाखंड, चालाकी, धूर्तता, इतने परदों के पीछे छिपी रहती है कि केवल व्यंग्य रचनाकार ही अपनी पैनी नजर से उसे देख पाता है । वह व्यक्तिगत रागद्वेष से मुक्त होकर व्यक्ति के इस पाखंड को पकड़ता है । किसी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, वर्ग आदि का मजाक उड़ाना व्यंग्यकार का उद्देश्य नहीं होता, बल्कि पाठकों को वह एक साफ-सुथरा दृष्टिकोण देना चाहता है । भावातिरेक के बजाय भावों की तरलता ही व्यंग्य लेखक की वास्तविक कुंजी हो सकती है ।  श्रीलाल शुक्ल, हरिशंकर परसाई, के.पी. सक्सेना, रवींद्रनाथ त्यागी, शरद जोशी, शंकर पुणतांबेकर आदि ने व्यंग्य साहित्य को अपनी लेखनी से समृद्ध किया है। 

पाठ परिचय ः प्रस्तुत व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार का मानना है कि झूठ को सच बताने में जो ताकत लगती है उसका सौंवाँ हिस्सा भी सच को सच साबित करने में नहीं लगता परंतु झूठ को ही सही कहना आधुनिक काल का फैशन है । आज ‘एक चीज के ऊपर दूसरी चीज फ्री’ इस लालच में फँसे व्यक्ति की परेशानियाँ बताते हुए ‘मुफ्त’ के चक्कर में अपना भला करने वाले हमारे आस-पास कई सारे लोग दिखाई देते हैं, उनसे ‘मुझे बचना है’ कहकर इस प्रवृत्ति पर व्यंग्य कसा है ।

Maharashtra Board Class 11 Hindi Yuvakbharati Solutions Chapter 4 मेरा भला करने वालों से बचाएँ

इधर मैं कई दिनों से बड़ा परेशान चल रहा हूँ । सब मेरा भला करना चाहते हैं । अखबार पढ़ने बैठता हूँ तो समाचार पढ़ने से पहले ढेर सारे कागज साथ में आ जाते हैं । कोई कहता है आपके द्वार पर आकर बैठे हैं । सभी तरह के इलाज के लिए क्लीनिक खोल दिया है । आप मोटे हैं तो पतला कर देंगे । पागल हैं तो ठीक कर देंगे । क्लीनिक से हर स्लिमिंग सेंटरवाला कह रहा है, ‘बस ! आप आ जाएँ, बाकी सब हम पर छोड़ दें । हलवाई की दुकानवाला कह रहा है, ‘ऐसी मिठाई आपने कभी न खाई होगी । 

मीठा खाएँ पर मीठे का असर न हो’, ऐसी चीनी का इस्तेमाल करते हैं वे । क्रेडिट कार्डवाला फ्री डेबिट कार्ड दे रहा है । पैसे खर्च करने या नकद खर्च की कोई जरूरत पहले नहीं है । आप बेवजह पैसे के पीछे दौड़ रहे हैं । हम सामान आपके घर लाना चाहते हैं, आप बस माल खरीदें ! गाड़ीवाला नई गाड़ी के कागज दिए जा रहा है । साथ में लोन देने वाला बैंक के कागज भी दिए जा रहा है । अखबार के साथ पंेफलेट इतने ज्यादा हैं कि उन्हें पढ़ने बैठ जाओ तो अखबार पढ़ने के लिए वक्त नहीं बचेगा । 

जिसे देखो, वही हमारी चिंता कर रहा है । मुस्कुराती, चहचहाती लड़कियों के झुंड के झुंड आपके पास किसी भी प्रदर्शनी को देखते वक्त आ जाएँगे । आपको लगेगा, हमने ऐसी क्या उपलब्धि पा ली है कि सभी हमारा आटोग्राफ लेना चाहते हैं । वे फार्म भरवा रही हैं । इनाम के लालच में फार्म के साथ कुछ उम्मीदें बँधाकर जा रही हैं । घर में बैठा हूँ, कोई साफ पानी पीने के लिए वॉटर फिल्टर लगाना चाह रहा है । पैसे की तो कोई बात ही नहीं करता, पैसे आते रहेंगे । आप बस, फार्म भर दीजिए । सब कुछ आसान किस्तों में है, पता ही नहीं चलेगा । क्रेडिट कार्डवाला नियमित रूप से विवरण भेज रहा है । आप बस पेट्रोल भरवाते रहें । साबुन माँगो तो कोई एक टिकिया देता ही नहीं । सीधे कम-से-कम चार टिकियाँ पकड़ाएँगे जिसमें एक मुफ्त । 

हर जगह एक फ्री का इतना चलन है कि लगता है सब जगह भाईचारा बढ़ गया है । कोई खाने की चीज छोटी नहीं रही । सीधे ‘लार्जर दॅन लाइफ’ हो गई है । पहले ज्यादा खाओ फिर पचाने के लिए पाचक गोलियाँ खाओ । इससे पहले की है, किसी ने किसी की इतनी चिंता ! लोग कोसते रहते हैं कि दुनिया से प्यार-मुहब्बत कम होती जा रही है । यह उनकी समझ की कमी है ? प्यार तो दोगुना-चौगुना बढ़ा है । पार्क घूमने जाता हूँ तो योग संस्थानवाले घेर लेते हैं । कहते हैं, सिर्फ घूमने से और सैर करने से क्या होगा । 

वे मुझे ‘योगा’ के फायदे समझाते हैं । मैं उन्हें अपने वक्त की समस्या और थोड़ा बहुत घर के कामकाज की समस्या बताता हूँ । पर वे इसे दुनियादारी मानकर मुझे सीख देने लगते हैं । वे हर जगह काँपीटिशन पैदा करना चाहते हैं । मैंने अपना पक्ष रखते हुए उन्हें बताया कि मैं इस सैर से ही फिट रहता हूँ । पर वे इसे मेरी नासमझी मान मुझे ‘योगा’ के फायदे ही बताए जा रहे हैं । अगले दिन सैर करने के लिए मुझे दूसरा पार्क देखना पड़ता है । मैं पिछले कुछ वक्त पहले इन ‘योगा’ वालों से प्रभावित रहा पर अब मेरा मोह भंग हो गया है । 

हुआ यूँ कि पार्क में घूमते-घूमते मैं इनके ठहाके सुनकर बड़ा अचंभित हुआ, सोचता कि आज के इस वक्त में ठहाके लगाने के लिए आखिर इनके पास नुस्खा क्या है । मैं भी कुछ सकुचाते और घूमने का बहाना बना उनके दायरे में शामिल हो गया । वहाँ जाकर पता चला कि उनका ठहाका लगाने का आधार था कि वे एक-दूसरे को चुटकुले सुनाते, जिस पर सभी समवेत स्वर में ठहाका लगाकर हँसते । मुझे ठहाका न लगाते देख और अपनी हँसी में योगदान न देते देख हैरान होते । बाद में मुझे इन चुटकुलों की समझ न रखने वाला मान माफ कर देते । मुझे जल्दी ही इन ठहाकों का राज समझ में आ गया और मैं अपने रास्ते वापस आ गया ।

 एक दिन दो युवा आए । कहने लगे, अखबार के दफ्तर से आए हैं । फिल्में दिखाते हैं और आपकी राय के लिए आपको आमंत्रित करेंगे । अच्छा लगा । उन्होंने फौरन काम शुरू कर दिया । जैसे ही मुझे किसी काम में व्यस्त देखा तो हस्ताक्षर के लिए कागज आगे कर दिया । पढ़ने को वक्त की बर्बादी समझ उन्होंने हस्ताक्षरवाली जगह बताकर मेरे हस्ताक्षर करवा लिए । वही हुआ था, जो होना था । थोड़े दिनों बाद एक चमचमाता क्रेडिट कार्ड आ गया । सारे मामले की छानबीन करने पर पता चला कि वे देश के भावी कर्णधार बेशक अखबार के ऑफिस से आए थे पर उनका किसी विदेशी बैंक से काँट्रेक्ट था । इस काँट्रेक्ट के चलते उन्हें क्रेडिट कार्ड बनवाने का लक्ष्य पूरा करना था । फिल्म देखने जाता हूँ । टिकट के साथ खाने का सामान शामिल कर लिया जाता है ।

 मैं खाने की मनाही करता हूँ । मुझे कुछ इस तरह से समझाया जाता है, ‘तीन घंटे की फिल्म में कोई भूखा-प्यासा थोड़े ही बैठेगा फिर खाने-पीने की लाइन में आपका लगना हमें अच्छा नहीं लगेगा ।’ उसे पता है भूख तो लगेगी । वह दूरदर्शी है । उससे दूसरे की भूख बरदाश्त नहीं होती । लाईन में लगने से कष्ट होगा । पहले ही इंतजाम कर देता है । मेरे द्वारा कोई तर्क करने से पहले ही तुरुप का पत्ता फेंकते हुए मुझे बताया जाता है ‘श्रीमान टिकट के साथ तो हम आधे पैसे चार्ज करते हैं । यह स्कीम आपके फायदे को ध्यान में रखकर ही जन कल्याण के लिए कुछ दिन पहले ही लाई गई है ।’ मैं जन कल्याण का फायदा उठाने के लिए और बहस नहीं करता । १०/- के पॉपकॉर्न १००/- में खाकर उनका एहसान मानने लगता हूँ । ‘मॉल’ में कपड़ों की सेल लगी है ।

 माल बेचने वाला चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है । ‘१5००/- की साड़ी ३5०/- में, १०००/- का कुर्ता २००/- में ।’ मैं जिज्ञासा वश पूछ बैठता हूँ ‘‘आप इतना सस्ता माल देकर अपना दीवाला क्यूँपिटवा रहे हो ।’’ वह झट से कहता है ‘‘मैं भारत माँ का सपूत हूँ । मुझे अपने देशवासियों से प्यार ह
ैं इस धरती का कर्ज उतारना चाहता हूँ ।’’ दरअसल वह सेकेंड का सस्ता माल बेचने के लिए अपने को धरती का लाल कहता है । वह अपने बलिदान के लिए उतारू है । वह व्यापारी है । हर चीज बेच लेता है । अपना कर्ज उतार रहा है । मैं निरुत्तर हो जाता हूँ । मैं उस महान आत्मा के सामने नतमस्तक हूँ । कोई दुकानवाला त्योहारों पर होने वाली छुट्‌टियों की अग्रिम सूचना दे रहा है । फलाँ-फलाँ तारीख को दुकान बंद रहेगी । आज ही जरूरत का सामान जमा कर लो । हमें तो आपकी बड़ी चिंता रहती है । 

हमें पता है, इसके बिना रह नहीं पाओगे । दोगुनी कीमत में पाने के लिए दर-दर भटकोगे । फिर लोग कहते हैं, मनुष्य में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है । जब तक हम रहेंगे, मनुष्यता बची रहेगी । बाजार की चिल्लपों से घबराकर घर आता हूँ । मनोरंजन के लिए टीवी ऑन करता हूँ । समाचार चैनल खबरों के नाम पर डरा रहे हैं । मौसम का हाल जानना चाहता हूँ तो 45 डिग्री के तापमान को कुछ इस तरह बताया जा रहा है ‘गर्मी की तपिश से जनता बेहाल । आकाश से आग की बरसात । आप अगर जीवित रहना चाहते हैं और अपना भला चाहते हैं तो घर से बाहर न निकलें ।’ आपका गर्मी से आया पसीना अब आपको पूरी तरह नहला देगा । इसी तरह सर्दी के खौफनाक वर्णन से आप रजाई में भी कँपकँपी महसूस कर सकते हैं । 

असल बात दर्शकों का मनोरंजन है । खबर भी पता चल जाए और मनोरंजन भी हो जाए । यह तो सोने पे सुहागावाली बात हो गई । वह एक खबर को दस बार अलग-अलग तरीके से फिर-फिर दोहराएगा । वह सबका भला चाहता है । उसका साध्य पवित्र है । साधन से समझौता कर ले पर साध्य साफ होना चाहिए । दरअसल यह हमारा भला चाहने वाले हैं जिनकी चिंता को हम ठीक से समझ नहीं पा रहे । गर्मी-सर्दी, सूखा-बाढ़ के प्रकोप से आदमी बच भी जाए, इनकी भाषा के मर्मांतक प्रहार से मरना लाजिमी है । मेरे मोहल्ले में ‘पुरुष ब्यूटी पार्लर’ खुल गया है । मुझे अपने पैर के लंबे नाखून कटवाने हैं । वह मेरा ‘फेशियल’ करना चाहता है । उसका कहना है, नाखून तो जुराबों में छिप जाएँगे पर मुँह तो सबको नजर आएगा । 

वह मेरी ‘फेस वेल्यू’ बढ़ाना चाहता है । मैं पैर के लंबे नाखून कटवाने पर अड़ा हूँ । पता नहीं क्या सोचकर वह मेरी बात मान गया । उसने मेरे पैर पानी में रखवाए । फिर बड़ी देर तक मेरे पैरों के नाखूनों को घिसता रहा । मुझे आज से पहले अपने नाखून इतने महत्त्वपूर्ण कभी नहीं लगे । वह मेरे मुड़े नाखून को सीधा करने लगा । बड़े तरीके से नये-नये औजारों से घिसने लगा । लगा, कोई संगमरमर की मूर्ति तराश रहा है । मैंने एतराज किया तो उसने मेरे एतराज पर घोर एतराज किया । उसने पैर के बड़े नाखून से होने वाली तकलीफों पर व्याख्यान दिया । उसने इसे नाखून कटवाने की जगह ‘पैडीक्योर’ नाम दिया । वह बड़ा लुभावना नाम था । 

मैं मान गया । मैं उसके तर्कों से खुशी-खुशी हार गया । उसने नाखून काटने के सिर्फ १०००/- लेकर मुझे मुक्त कर दिया । रास्ते से जा रहा था । एक लंबी कतार ने मेरा ध्यान आकर्षित कर लिया । उस कतार में मैंने झाँककर देखा कतार मोबाइल खरीदने वालों की थी । चिल्ला-चिल्लाकर स्पीकर पर सूचना दी जा रही थी । ‘‘मोबाइल खरीदो और सिम कार्ड मुफ्त में पाओ, टॉक टाइम भी साथ में ले जाओ’’। सुनकर मैं भी मोबाइल कतार का एक हिस्सा बन गया और उस भीड़ में दिनभर खड़े होकर मोबाइल का मालिक बन गया । उस दिन से जेब में घंटियाँ बजने की राह देखता रहा । मैंने मोबाइल खरीदा है । स्विच ऑन किए बैठा हूँ । 

कोई फोन आ नहीं रहा । बीच-बीच में चेक कर लेता हूँ । कहीं कोई गलत बटन तो नहीं दबा बैठा । मेरे पास ही दो प्रॉपर्टी डीलर और दो युवा लड़के बैठे हैं । उन्हें धड़ाधड़ फोन आ रहे हैं । दीवाली की शुभकामनाएँ आ रही हैं । ठीक है जो हमारा शुभ कर पाए, उसे ही तो शुभकामनाएँ दी जानी चाहिए । जो न कुछ दे सके, न फायदा कर सके, उसका क्या शुभ और उसकी क्या शुभकामनाएँ । मैंने कुछ दोस्तों को निर्देश दिए हैं कि फोन मोबाइल पर ही करना । ऑफिस का फोन ध्यान आकर्षित नहीं करता । मोबाइल फोन ध्यान खींचता है । जब तक मोबाइल दूसरे का ध्यान न बाँटे तब तक फोन का क्या मतलब है । 

जिंदगी में इतना कुछ करना है पर जिंदगी मुई छोटी है । अपनी और दूसरों की जिंदगी दाँव पर लगानी होती है । व्यस्तता का यह आलम है कि आदमी सड़क पर चलते- चलते फोन कर रहा है । पता नहीं कौन लोग हैं जो कहते हैं भारत और अमेरिका का मुकाबला नहीं किया जा सकता । ‘सेल’ फोन से हम हीनता की ग्रंथि से मुक्त हुए हैं । सभी को साथी मिल गया है । एक-दूसरे से मिलकर बात कम करें, फोन पर ज्यादा करें । फोन पर आम बात भी खास लगती है । उसमें करेंट दौड़ जाता है । घर से ठीक-ठीक निकला आदमी ऑफिस पहुँचकर अपने पहुँचने की खबर दे रहा है । सब एकाएक एक-दूसरे के करीब हो गए हैं । 

मेरे हाथ में भी मोबाइल आ गया, उस मोबाइल से मुझे भी प्यार हो गया लेकिन कब से राह देख रहा हूँ मुफ्त में मिले सिम कार्ड से मोबाइल पर घंटी क्यों नहीं बजती । याद रखें, घोषित तौर पर अपना नुकसान करने वालों से फिर आप बच सकते हैं । कुछ अपनी सुरक्षा की तैयारी कर सकते हैं पर इन फायदा करने वालों से बचने की ज्यादा जरूरत है । यह हर हालत में आपका ‘फायदा’ करके ही मानेंगे । मैंने कई बार इन भला करने वालों को समझाया है कि क्यों मेरे पीछे पड़े हो । मुझे अपना भला नहीं करवाना है ।

 ऐसे ही ठीक हूँ । भला करने वाला मेरी निष्क्रियता को नजरअंदाज करते हुए मेरे फायदे के नुस्खे समझा रहा है ‘‘यह ले लो, वो फ्री । वो ले लो, ये फ्री ।’’ पता नहीं वे कौन लोग हैं जो आए दिन ‘जमाना बुरा है’ कहकर एक-दूसरे को परेशान करते रहते हैं । यहाँ तो भला करने वाले परेशान करने की हद तक भला करने लगे हैं । बुरा करने वालों से आदमी सीधे टकरा जाए या किसी दूसरे की मदद माँग ले पर इन भला करने वालों को तो पहचानना ही मुश्किल है । आप तो बस प्लीज, मुझे किसी तरह इन भला करने वालों से बचाएँ । (‘झूठ बराबर तप नहीं’ व्यंग्य संग्रह से)

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