छोटी सी कविता हिंदी में – chhoti si kavita

 बच्चों के लिए 20 लघु व हास्य कविताएं | Chhote Bacchon Ke Liye Poem (Kavita)

कविता को सभी लोगो को पडणा चाहिये क्यूकी हम जब कविता पडते है तो हमारे मन में positive vibes आती है | हम किसी भी दृश्य का कविता मे रूपांतर कर सकते है जिसे व दृश्य हमारे मन में सदा जीवित रहता है | हमारा सामाजिक ज्ञान बढाने के लिए हमे अधिक से अधिक कविता को पडणा चाहिये| इसलिये आज हम आप सभी के लिये छोटीसी कविता लेकर आये है जो देखने मे बहुत ही छोटीसी है और पडणे मे आपको बहुत टाइम नही लगेगा |

मी अशी आशा करती हो के लघु कविताये आपको बहुत पसंद आयेंगे शुरू करते है हमारी आज किल्ले को छोटीसी कविता हिंदी में |

बच्चों के लिए 10 लघु कविताएं | Baccho Ke Liye Laghu Kavita

ठीक समय पर

ठीक समय पर नित उठ जाओ,

ठीक समय पर चलो नहाओ,

ठीक समय पर खाना खाओ,

ठीक समय पर पढ़ने जाओ।

ठीक समय पर मौज उड़ाओ,

ठीक समय पर गाना गाओ,

ठीक समय पर सब कर पाओ,

तो तुम बहुत बड़े कहलाओ।

– सोहनलाल द्विवेदी

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लोग क्या कहेंगे – attitude poetry in hindi ।। Small love poetry in hindi


जो ये कहते थे कि रास्ते में बिखर जाऊंगा,

चल रहे थे मेरे साथ कहा है वो लोग।

चल रहे थे मेरे साथ कहा है वो लोग,

हौसला हार के बैठूंगा तो मर जाऊंगा।

मंजिले लाख कठिन आये गुजर जाऊंगा।

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बाल दिवस पर कविताएं: Children’s Day Poems in Hindi


हम थें और बस हमारें सपने

हम थें और बस हमारें सपने,

उस छोटी सी दुनियां के थे हम शहजादे।

लग़ते थे सब अपनें-अपनें,

अपना था वह मिट्टीं का घरौदा,

अपनें थे वह गुड्डें-गुडिया,

अपनी थी वह छोटी सी चिडिया,

और उसकें छोटें से बच्चें।

अपनी थी वह परियो की क़हानी,

अपने से थें दादा-दादी, नाना और नानी।

अपना सा था वह अपना गांव,

बारिश की बूंदे कागज की नाव।

माना अब वह सपना सा हैं,

पर लग़ता अब भीं अपना सा हैं।


दुनियां के सुख़ दुख़ से बेगानें,

चलतें थे हम बनक़े मस्तानेे।

कभीे मुहल्ले की गलियो मे,

और कभीं आमो के बागो मे।

कभीं अमरुद के पेड की डालियो पर,

और कभीं खेतो की पगडडियों पर।

इस मस्ती से ख़ेल-ख़ेल मे,

न ज़ाने कब बूढ़े हो गये हम।

बींत गया वह प्यारा बचपन,

न ज़ाने कहां ख़ो गये हम।

- निधि अग्रवाल

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दिवाली पर छोटी सी कविता -

हर घर, हर दर, ब़ाहर, भींतर,

नीचें ऊ़पर, हर जग़ह सुघ़र,

कैंसी उजियाली हैं पग़-पग़,

जग़मग जगमग़ जगमग़ जगमग!

छज्जो मे, छत मे, आलें मे,

तुलसी कें नन्हे थाले मे,

यह कौंन रहा हैं दृग़ को ठग़?

जगमग़ जगमग़ जगमग जगमग़!

पर्वत मे, नदियो, नहरो मे,

प्यारीं प्यारीं सी लहरो मे,

तैरतें दीप कैंसे भग-भग़!

जगम़ग जगमग़ जगमग जगमग़!

राजा के घर, कंग़ले कें घर,

है वहीं दीप सुन्दर सुन्दर!

दीवाली की श्रीं हैं पग-पग़,

जगमग़ जगमग जगमग़ जगमग

- सोहनलाल द्विवेदी

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दिवाली पर छोटी सी कविता -

लों दीए जलाओं ग़ली-ग़ली

आईं दिवाली हैं।

लग़ती हैं सब़को भली-भलीं

आईं दिवाली हैं।।

बाज़ार सजीं लक्ष्मी-ग़णेश-

खीलो फुलझड़ियो सें।

कन्दीले देखों ज़ली-जलीं

आईं दिवाली हैं।।

हर ओर रोशनीं का मेला-

हैं धूम पटाखो की।

अन्धियारें की छवि ढलीं-ढलीं

आईं दिवाली हैं।।

खिल उठीं मिठाईं खेल-खिलौंने-

खाक़र खुशियो सें

बच्चो कें दिल की क़ली-क़ली

आईं दिवाली हैं।।

- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

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माधव तनेजा द्वारा रचित / Poetry by Madhav Taneja

तीन वर्णों का यह शब्द

हमें बहुत कुछ सिखाता है,

यह हमें जीवन में कुछ

नया करने का तरीका बताता है।

प्रयास करता रहता है जो मनुष्य बार-बार,

जो हार कर भी कभी नहीं मानता है हार,

वह जीवन में अवश्य ही

कुछ ना कुछ कर जाता है।

सफलता का घड़ा

प्रयास से ही तो भरता है।

कोशिश करके हार जाओ तो शोक मत करना,

इन छोटे-छोटे पत्थरों से तुम ना डरना।

चाहे जो भी हो जाए तुम बस अपना कर्म करना।

अरे हार तो केवल दो वर्णों का शब्द है,

तुम तीन वर्णों वाले शब्द पर ध्यान धरना।

मेहनत करो, करते रहो

एक दिन सफल हो जाओगे,

अपनी मंज़िल तो तुम

प्रयास से ही पाओगे।

चाहे सब कुछ हो जाए समाप्त

जीवित रहनी चाहिए आस,

यदि उजाला कम है तो एक दीया तो जलाओ,

अपने प्रयासों से इस संसार को तुम जगमगाओ|

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पर्वत कहता शीश उठाकर

पर्वत कहता शीश उठाकर,

तुम भी ऊंचे बन जाओ।

सागर कहता है लहराकर,

मन में गहराई लाओ।


समझ रहे हो क्या कहती हैं,

उठ-उठ गिर-गिर तरल तरंग।


भर लो-भर लो अपने दिल में,

मीठी-मीठी मृदुल उमंग।


पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो,

कितना ही हो सिर पर भार।


नभ कहता है फैलो इतना,

ढक लो तुम सारा संसार।


– सोहनलाल द्विवेदी


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जीवन पर कविता – a poetry in hindi on life


मन ऐसा रखो की किसी को बुरा न लगे।

दिल ऐसा रखो कि किसी को दुखी न करें।

स्पर्श ऐसा रखो कि किसी को दर्द ना हो।

रिश्ता ऐसा रखो कि उसका अन्त ना हो।


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दिवाली पर छोटी सी कविता -

ज़लाईं जो तुमनें-

हैं ज्योति अंतस्तल मे ,

जीवनभर उसकों

जलाएं रखूंगा |


तन मे तिमिर कोईं

आयें न फिरसे,

ज्योतिगर्मंय मन क़ो

ब़नाएं रखूंगा |


आंधी इसें उडा़ये नही

घर कोई ज़लाए नही

सब़से सुरक्षित

छिपाएं रखूंगा |


चाहें झझावात हों,

या झमक़ती ब़रसात हो

छप्पर अटूट एक़

छवाएं रखूगा |


दिल-दीया टूटें नही,

प्रेम घी घटें नही,

स्नेंह सिक्त ब़त्ती

बनाएं रखूंगा |


मै पूज़ता नो उसकों ,

पूजें दुनियां जिसकों ,

पर, घर मे इष्ट देवी बिठाएं |


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नदी पर कविता | Poem on River in Hindi


मै नदी हू

हिमालय क़ी गोद से ब़हती हू

तोडकर पहाड़ो को अपनें साहस से

सरल भाव़ से ब़हती हू।

 

लेक़र चलती हू मै सब़को साथ

चाहें कंकड हो चाहें झाड

बंज़र को भी उपजाउ ब़ना दू

ऐसी हू मै नदी।


बिछड़ो को मै मिलाती

प्यासें की प्यास मे बुझ़ाती

क़ल-क़ल करके मै बहती

सुर ताल लगाक़र संगीत बज़ाती।


कही पर गहरीं तो कही पर ऊथली हो ज़ाती

ना कोई रोक़ पाया ना कोई टोक़ पाया

मै तो अपनें मन से अविरल ब़हती

मै नदी हू।


मै नदी हू

सब़ सहती चाहें अॉधी हो या तूफ़ान

चाहें शीत और चाहें गर्मी

कभीं ना रूक़ती, कभीं ना थक़ती

मै नदी सारें जहां मे ब़हती।

– नरेंद्र वर्मा


वो एक नदी है

हिमखडों से पिघलक़र,

पर्वतो में निक़लकर,

खेत खलिहानो को सीचती,

क़ई शहरो से गुज़रकर

अविरल ब़हती, आगे बढती,

ब़स अपना गन्तव्य तलासती

मिल ज़ाने मिट ज़ाने,

ख़ो देने को आतुर

वो एक़ नदी हैं।


बढ रही आब़ादी

विक़सित होती विक़ास की आधी

तोड पहाड, पर्वतो को

ढूढ रहे नयी वादी,

गर्म होती निरन्तर धरा,

पिघलतें, सिकुडते हिमख़ड

कह रहें मायूस हों,

शायद वो एक़ नदी हैं।


लुप्त होतें पेड़ पौधें,

विलुप्त होती प्रज़ातियां,

ख़त्म होते ससाधन,

सूख़ रही वाटिकाये

छोटे क़रते अपने अॉगन,

गौरेयां, पंछी सब ग़ुम गये,

पेड़ो के पत्तें भी सूख़ गये

सूख़ी नदी का क़िनारा देख़,

बच्चें पूछते नानी से,

क्या वो एक़ नदी थी।


छोटी-सी हमारी नदी

छोटी-सी हमारीं नदी टेढी-मेढी धार,

गर्मियो में घुटने भर भीगो कर ज़ाते पार।

पार ज़ाते ढोर-डंग़र, बैलगाडी चालू,

ऊचे है किनारें इसके, पाट इसक़ा ढालू।

पेटे मे झक़ाझक बालू कीचड का न नाम,

कास फ़ूले एक़ पार उजले ज़ैसे घाम।

दिन भर क़िचपिच-किचपिच क़रती मैना डार-डार,

रातो को हुआ-हुआ क़र उठतें सियार।

अमराईं दूज़े किनारे और ताड-वन,

छाहो-छाहो बाम्हन टोला ब़सा हैं सघन।

कच्चें-बच्चें धार-कछारो पर उछल नहा ले,

गमछो-गमछो पानी भर-भर अंग़-अंग़ पर ढ़ाले।

कभीं-कभीं वे सांझ-सकारे निब़टा कर नहाना

छोटी-छोटी मछलीं मारे आंचल का क़र छाना।

बहुए लोटें-थाल मांजती रगड-रगड कर रेती,

कपडे धोतीं, घर के कामो के लिये चल देती।

ज़ैसे ही आषाढ ब़रसता, भर नदियां उतराती,

मतवाली-सी छूटीं चलती तेज़ धार दन्नाती।

वेग़ और क़लकल के मारें उठता हैं कोलाहल,

ग़दले जल मे घिरनी-भंवरी भंवराती हैं चंचल।

दोनो पारो के वन-वन मे मच ज़ाता हैं रोला,

वर्षां के उत्सव मे सारा ज़ग उठता हैं टोला।

~ रवींद्रनाथ ठाकुर


Nadi Par Kavita

यदि हमारें बस मे होता,

नदी को उठाक़र घर ले आतें।

अपने घर के ठीक़ सामनें,

उसक़ो हम हर रोज़ बहातें।

कूद-क़ूद कर उछल-उछल क़र,

हम मित्रो के साथ नहातें।

कभीं तैरते कभीं डूबते,

इतरातें गाते मस्तातें।

‘नदी आई हैं’ आओं नहानें,

आमन्त्रित सब़को क़रवाते।

सभी उपस्थित भद्र ज़नो का,

नदियां से परिचय क़रवाते।

यदि हमारें मन मे आता

झ़टपट नदी पार क़र ज़ाते।

खडे-खडे उस पार नदी क़े

मम्मी मम्मी हम चिल्लातें।

शाम ढ़ले फ़िर नदी उठाक़र

अपने कन्धे पर रख़वाते।

लाये ज़हां से थे हम उसक़ो

ज़ाकर उसे वही रख़ आते।

खडे-खडे उस पार नदी के

मम्मी मम्मी हम चिल्लातें।

शाम ढलें फ़िर नदी उठाक़र

अपने कन्धे पर रख़वाते।

लाए ज़हां से थे हम उसक़ो

ज़ाकर उसे वही रख़ आते।


नदी

नदी निक़लती हैं पर्वत से,

मैदानो में ब़हती हैं।

और अन्त मे मिल साग़र से,

एक़ कहानी क़हती हैं।

बचपन मे छोटी थी पर मै,

बडे वेग से ब़हती थी।

आंधी-तूफ़ान, बाढ-बवन्डर,

सब कुछ हंसकर सहती थी।

मैदानो मे आक़र मैंने,

सेवा का संकल्प लिया।

और ब़ना ज़ैसे भी मुझ़से,

मानव का उपक़ार किया।

अन्त समय मे ब़चा शेष जो,

साग़र को उपहार दिया।

सब़ कुछ अर्पिंत करकें अपने,

ज़ीवन को साक़ार किया।

बच्चो शिक्षा लेक़र मुझ़से,

मेरें ज़ैसे हो जाओं।

सेवा और समर्पंण से तुम,

ज़ीवन बगियां महकाओ।


Nadiyon par Kavita in Hindi

नदी क़ी धारा

क़ल कल क़रती नदी क़ी धारा.

बही ज़ा रही बढी जा रही.

प्रगति पथ पर चढी ज़ा रही.

सब़को जल ये दिए जा रही.

पथ न कोईं रोक़ सके.

और न कोई टोक़ सकें.

चट्टानो से टक़राती हैं,

तूफानो से भीड ज़ाती हैं.

रूक़ना इसे कब़ भाता हैं.

थक़ना इसे नही आता हैं.

सोद्देश्य स्व-पथ पर पल पल

ब़स आगे बढती ज़ाती हैं.

क़ल -क़ल करती ज़ल की धारा.

ज़ौहर अपना दिख़लाती है.

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चांद का कुर्ता

हठ कर बैठा चांद एक दिन माता से यह बोला,

सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े में मरता हूं,

ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,

न हो अगर, तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, अरे सलोने!

कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है पर मैं तो डरती हूं,

एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा कभी एक फुट मोटा,

बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

घटता बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,

नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही यह बता नाप तेरा किस रोज लिवायें?

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये?


– रामधारी सिंह ‘दिनकर’

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प्रकृति से सीखो – chhoti si kavita in hindi ।। Small kavita

खिलों फूल से क्योंकि कभी वे

अपने लिए नही खिलते हैं

फलों वृक्ष से क्योंकि कभी वे

अपने लिए नही फलते है।

प्यासे जग की प्यास बुझाने

बादल जल भर भर लाते हैं।

सीखो उनसे वे कैसे

औरों के हित में मिट जाते हैं।

पर हित के लिए देह

धारण करते हैं सज्जन प्राणी।

वृक्ष स्वयं न कभी फल खाते

नदिया स्वयं न पीती पानी।

जंगल मंगल हित जीने वालों

का मस्तक ऊंचा रहता है।

दीपक की स्वर्णिम लौ का रुख

कभी नहीं नीचे झुकता है।

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छोटी कविता – small poetry ।। Chhoti si kavita for class 1

सकारात्मक सोचिए

आपकी जिंदगी बदल जायेगी

जीवन अंधकार में है

 थोड़ी सी रोशनी मिल जाएगी।

उस रोशनी में

एक नई राह नजर आएगी

निराशा को भूलकर

आशा की जोत जलाइये,

नफरत, ईर्ष्या, अहंकार को भूलकर,

प्यार का सागर बहाइए

सकारात्मक सोचिए आपकी जिंदगी बदल जायेगी

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 बिल्ली को जुकाम

बिल्ली बोली – बड़ी जोर का,

मुझको हुआ जुकाम,

चूहे चाचा, चूरन दे दो,

जल्दी हो आराम।

चूहा बोला – बतलाता हूं,

एक दवा बेजोड़,

अब आगे से चूहे खाना,

बिल्कुल ही दो छोड़!

– श्री प्रसाद

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नैतिक कविता – small poetry in hindi ।। Naitik poem in hindi

बोल सको तो मीठा बोलो

कटु बोलना मत सीखो।

बना सको तो राह बनाओ

पथ से भटकना मत सीखो।

कमा सको तो पुण्य कमाओ

पाप कमाना मत सीखो।

लगा सको तो बाग लगाओ

आग लगाना मत सीखो।

इस तरह न कमाओ की पाप हो जाए।

इस तरह न बोलो की क्लेश हो जाए।

इस तरह न खर्च करो की कर्ज हो जाए।

इस तरह न चलो की देर हो जाए।

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चमत्कारी किताब – Bal kavita । Hindi poem for class 1

ज्ञान का भंडार हैं किताब।

शिक्षा का आधार है किताब।

भूले भटकों को राह दिखाती।

मनोरंजन का भंडार हैं किताब।

जिज्ञासुओं की प्यास बुझती।

ऐसी होती हैं मजेदार किताब।

पथभ्रष्ट को सबक सिखाती।

मिटाती सब अंधकार किताब।

आंख खुलती पाकर साथ इसका।

ऐसी उपकारी है किताब।

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अगर पेड़ भी चलते होते

अगर पेड़ भी चलते होते,

कितने मजे हमारे होते,

बांध तने में उसके रस्सी,

चाहे जहां कहीं ले जाते।

जहां कहीं भी धूप सताती,

उसके नीचे झट सुस्ताते,

जहां कहीं वर्षा हो जाती,

उसके नीचे हम छिप जाते।


लगती भूख यदि अचानक,

तोड़ मधुर फल उसके खाते,

आती कीचड़-बाढ़ कहीं तो,

झट उसके उपर चढ़ जाते।


अगर पेड़ भी चलते होते,

कितने मजे हमारे होते!


– डॉ. दिविक रमेश

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कोशिश – chhoti si poetry ।। chhoti si kavita

मंजिल न पा सके तो क्या

चार कदम चलना सीखो।

आकाश न छू सको तो क्या

पंक्षी की तरह उड़ना तो सीखो।

क्या तुम हो उस शिशु से बढ़कर

 पहुंचे मंजिल तक घुटनों के बल चलकर

क्या तुम हो उस पंक्षी से बढ़कर

बनता जिसका  नीड़ उजड़ उजड़ कर।

सफल न हो सको तो क्या

भाग लेना तो सीखो।

गा न सको तो कुछ बोलो तो सही।

तैर न सको तो पानी में भिगो तो सही।

मोती न पा सको तो क्या

सागर में गहरे उतरना तो सीखो।

मंजिल न पा सको तो क्या

चार कदम चलना तो सीखो।

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बाल कविताएं बच्चों के लिए -14 आसान व छोटी कविताएं

 बिल्ली को जुकाम

बिल्ली बोली – बड़ी जोर का

मुझको हुआ जुकाम,

चूहे चाचा, चूरन दे दो

जल्दी हो आराम!

चूहा बोला – बतलाता हूँ

एक दवा बेजोड़,

अब आगे से चूहे खाना

बिल्कुल ही दो छोड़!


– श्री प्रसाद

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कोयल

देखो कोयल काली है,

पर मीठी है इसकी बोली,

इसने ही तो कूक–कूककर,

आमों में मिसरी घोली।

कोयल-कोयल सच बतलाओ,

क्या संदेशा लाई हो,

बहुत दिनों के बाद आज फिर,

इस डाली पर आई हो।

क्या गाती हो? किसे बुलाती?

बतला दो कोयल रानी,

प्यासी धरती देख मांगती,

क्या मेघों से पानी?

कोयल यह मिठास क्या तुमने,

अपनी मां से पाई है,

मां ने ही क्या मीठी बोली,

यह सिखलाई है

डाल डाल पर उड़ना–गाना,

जिसने तुम्हें सिखाया है,

सबसे मीठे–मीठे बोलो,

यह भी तुम्हें बताया है।

बहुत भली हो तुमने मां की,

बात सदा ही मानी है,

इसलिये तो तुम कहलाती,

हो सब चिड़ियों की रानी।

– सुभद्रा कुमारी चौहान

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आए बादल

आसमान पर छाए बादल,

बारिश लेकर आए बादल।

गड़-गड, गड़-गड़ की धुन में,

ढोल-नगाड़े बजाए बादल।

बिजली चमके चम-चम, चम-चम,

छम-छम नाच दिखाए बादल।

चले हवाएं सन-सन, सन-सन,

मधुर गीत सुनाए बादल।

बूंदें टपके टप-टप, टप-टप,

झमाझम जल बरसाए बादल।

झरने बोले कल-कल, कल-कल,

इनमें बहते जाए बादल।

चेहरे लगे हंसने-मुस्कुराने,

इतनी खुशियां लाए बादल।

– ओम प्रकाश चोरमा

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अगर पेड़ भी चलते होते 

अगर पेड़ भी चलते होते,

कितने मजे हमारे होते,

बांध तने में उसके रस्सी,

चाहे जहाँ कहीं ले जाते।

जहाँ कहीं भी धूप सताती,

उसके नीचे झट सुस्ताते,

जहाँ कहीं वर्षा हो जाती,

उसके नीचे हम छिप जाते।

लगती भूख यदि अचानक,

तोड मधुर फल उसके खाते,

आती कीचड-बाढ क़हीं तो,

झट उसके उपर चढ जाते।

अगर पेड़ भी चलते होते

कितने मजे हमारे होते!

– डॉ दिविक रमेश 

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सुबह

सूरज की किरणें आती हैं,

सारी कलियां खिल जाती हैं,

अंधकार सब खो जाता है,

सब जग सुंदर हो जाता है।

चिड़ियां गाती हैं मिलजुल कर,

बहते हैं उनके मीठे स्वर,

ठंडी-ठंडी हवा सुहानी,

चलती है जैसी मस्तानी।

यह प्रात की सुख बेला है,

धरती का सुख अलबेला है,

नई ताजगी, नई कहानी,

नया जोश पाते हैं प्राणी।

खो देते हैं आलस सारा,

और काम लगता है प्यारा,

सुबह भली लगती है उनको,

मेहनत प्यारी लगती जिनको।

मेहनत सबसे अच्छा गुण है,

आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है,

अगर सुबह भी अलसा जाए,

तो क्या जग सुंदर हो पाए?

– श्री प्रसाद

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आए बादल  

आसमान पर छाए बादल,

बारिश लेकर आए बादल।

गड़-गड़, गड़-गड़ की धुन में,

ढोल-नगाड़े बजाए बादल।

बिजली चमके चम-चम, चम-चम,

छम-छम नाच दिखाए बादल।

चले हवाएँ सन-सन, सन-सन,

मधुर गीत सुनाए बादल।

बूंदें टपके टप-टप, टप-टप,

झमाझम जल बरसाए बादल।

झरने बोले कल-कल, कल-कल,

इनमें बहते जाए बादल।

चेहरे लगे हंसने-मुस्कुराने,

इतनी खुशियां लाए बादल 

– ओम प्रकाश चोरमा

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 पर्वत कहता 

पर्वत कहता

शीश उठाकर

तुम भी ऊँचे बन जाओ।

सागर कहता है

लहराकर

मन में गहराई लाओ।

समझ रहे हो

क्या कहती है

उठ-उठ गिर गिर तरल तरंग।

भर लो, भर लो

अपने मन में

मीठी-मीठी मृदुल उमंग।

धरती कहती

धैर्य न छोड़ो

कितना ही हो सिर पर भार।

नभ कहता है

फैलो इतना

ढक लो तुम सारा संसार।

– सोहन लाल द्विवेदी 

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एक किरण आई छाई

एक किरण आई छाई,

दुनिया में ज्योति निराली,

रंगी सुनहरे रंग में,

पत्ती-पत्ती डाली डाली।

एक किरण आई लाई,

पूरब में सुखद सवेरा,

हुई दिशाएं लाल,

लाल हो गया धरा का घेरा।

एक किरण आई हंस-हंसकर,

फूल लगे मुस्काने,

बही सुगंधित पवन,

गा रहे भौरें मीठे गाने।

एक किरण बन तुम भी,

फैला दो दुनिया में जीवन,

चमक उठे सुन्दर प्रकाश से,

इस धरती का कण कण।

– सोहनलाल द्विवेदी

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जब सूरज जग जाता है

आंखें मलकर धीरे-धीरे,

सूरज जब जग जाता है।

सिर पर रखकर पांव अंधेरा,

चुपके से भग जाता है।

हौले से मुस्कान बिखेरी,

पात सुनहरे हो जाते।

डाली-डाली फुदक-फुदक कर,

सारे पंछी हैं गाते।

थाल भरे मोती लेकर के,

धरती स्वागत करती है।

नटखट किरणें वन-उपवन में,

खूब चौंकड़ी भरती हैं।


कल-कल बहती हुई नदी में,

सूरज खूब नहाता है।

कभी तैरता है लहरों पर,

डुबकी कभी लगाता है।

पर्वत-घाटी पार करे,

मैदानों में चलता है।

दिनभर चलकर थक जाता,

सांझ हुए फिर ढलता है।

नींद उतरती आंखों में,

फिर सोने चल देता है।

हमें उजाला दे करके,

कभी नहीं कुछ लेता है।

– रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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बच्चों के लिए 10 हास्य कविताएं

क्रिकेट

बिल्ली यह बोली चूहों से,

आओ खेलें खेल,

प्यारा क्रिकेट, खेल निराला,

मन का होगा मेल।

लकड़ी की थी गेंद और था,

खूब बड़ा-सा बल्ला,

खेल शुरू जब हुआ फील्ड में,

मचा धमाधम हल्ला।

चूहे ने दिखलाई फुर्ती,

कसकर मारा छक्का,

होश उड़े फिर तो बिल्ली के,

रह गई हक्का-बक्का।

भूल गई वह अपना वादा,

झट चूहों पर झपटी,

चूहे बोले-भागो, भागो,

यह तो निकली कपटी।

– प्रकाश मनु

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सुबह 

सूरज की किरणें आती हैं,

सारी कलियां खिल जाती हैं,

अंधकार सब खो जाता है,

सब जग सुंदर हो जाता है।

चिड़ियां गाती हैं मिलजुल कर,

बहते हैं उनके मीठे स्वर,

ठंडी-ठंडी हवा सुहानी,

चलती है जैसी मस्तानी।

यह प्रातः की सुख बेला है,

धरती का सुख अलबेला है,

नई ताजगी, नई कहानी,

नया जोश पाते हैं प्राणी।

खो देते हैं आलस सारा,

और काम लगता है प्यारा,

सुबह भली लगती है उनको,

मेहनत प्यारी लगती जिनको।

मेहनत सबसे अच्छा गुण है,

आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है,

अगर सुबह भी अलसा जाए,

तो क्या जग सुंदर हो पाए।

– श्री प्रसाद 

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 मुर्गे की शादी

ढम-ढम, ढम-ढम ढोल बजाता,

कूद-कूदकर बंदर,

छम-छम घुंघरू बांध नाचता,

भालू मस्त कलंदर!

कुहू-कुहू-कू कोयल गाती,

मीठा मीठा गाना,

मुर्गे की शादी में है बस,

दिन भर मौज उड़ाना!

– श्री प्रसाद

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मुर्गे की शादी 

ढम-ढम, ढम-ढम ढोल बजाता

कूद-कूदकर बंदर,

छम-छम घुँघरू बाँध नाचता

भालू मस्त कलंदर!

कुहू-कुहू-कू कोयल गाती

मीठा मीठा गाना,

मुर्गे की शादी में है बस

दिन भर मौज उड़ाना!

– श्री प्रसाद 

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फुदकू जी फिसल गए

यहां गए, फिर वहां गए,

फुदकू जी अब कहां गए?

जहां-जहां जाते फुदकू जी,

एक हंगामा होता है,

दुनिया उथल-पुथल हो जाए,

ऐसा ड्रामा होता है।

वहां-वहां पर धूम मचाई,

फुदकू जी जब, जहां गए।

चिड़ियाघर में भालू देखा,

तो नाचे भालू बनकर,

हाथी एक नजर आया तो,

उस पर जा बैठे तनकर।

बोर हुए, तो झटपट कूदे,

फुदकू जी अब कहां गए?

कितनी ऊधमबाजी होगी,

होगी कितनी मनमर्जी,

बोलो फुदकू, प्यारे फुदकू,

मान नहीं लेते क्यों गलती?

थोड़ा तो अब घर पर बैठो,

सुनकर वे तमतमा गए।

प्रकाश मनु

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बतूता का जूता 

इब्न बतूता पहन के जूता,

निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गई

थोड़ी घुस गई कान में।

कभी नाक को कभी कान को।

मलते इब्न बतूता,

इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता।

उड़ते-उड़ते उनका जूता,

जा पहुँचा जापान में।

इब्न बतूता खड़े रह गए,

मोची की दूकान में।

– सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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टूट गया किस्से का तार 

टूट गया किस्से का तार,

अगड़म-बगड़म गए बाजार

वहाँ से लाए मोती चार।

दो मोती थे टूटे-फूटे

बाकी दो हाथों से छूटे,

अगड़म-बगड़म दोनों रूठे!

आगे आया नया बाजार,

पीं-पीं बाजा, सीटी चार

लेकर बोले अगड़म-बगड़म।

लिख लो, यह सब रहा उधार

पैसे कल ले लेना यार!

अगडत्रम उछल-उछलकर चलता

बगड़म फिसल-फिसलकर बढ़ता,

पीछे पड़ गए कुत्ते चार।

कूद गए पानी में दोनों,

झटपट पहुँचे नदिया पार!

अगड़म रोता इधर खड़ा है

बगड़म भी उखड़ा-उखड़ा है,

अब ना पीं-पीं, अब ना बाजा।

फूटा घुटना, फूट गया सिर-

टूट गया किस्से का तार!

– प्रकाश मनु 

_________

चाबी वाला जोकर

जन्मदिवस पर चाचा लाए,

चाबी वाला जोकर,

मुझको खूब हंसाया करता,

ताली बजा-बजाकर।

खूब नुकीली, पर तिरछी-सी,

इसकी जो है टोपी,

उसे देखकर खुश होता है,

नन्हा भैया गोपी।

हाथ हिलाकर, गाल फुलाकर,

यह है डांस दिखाता,

डांस दिखाकर थोड़ा-थोड़ा,

गर्दन को मटकाता।

और अंत में बड़े मजे से,

करता है-आदाब,

हंस-हंस कहते मम्मी-पापा-

इसका नहीं जवाब!

– प्रकाश मनु

_____________

 टीचर जी मत पकड़ो कान 

टीचर जी!

मत पकड़ो कान।

सरदी से हो रहा जुकाम 

लिखने की नही मर्जी है।

सेवा में यह अर्जी है

ठण्डक से ठिठुरे हैं हाथ।

नहीं दे रहे कुछ भी साथ

आसमान में छाए बादल।

भरा हुआ उनमें शीतल जल 

दया करो हो आप महान।

हमको दो छुट्टी का दान 

जल्दी है घर जाने की।

गर्म पकोड़ी खाने की 

जब सूरज उग जाएगा।

समय सुहाना आयेगा 

तब हम आयेंगे स्कूल।

नहीं करेंगे कुछ भी भूल 

– डॉ रूप चंद्र शास्त्री ‘मयंक’

---------------

बतूता का जूता

इब्न बतूता पहन के जूता,

निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गई,

थोड़ी घुस गई कान में।

कभी नाक को कभी कान को,

मलते इब्न बतूता,

इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता।

उड़ते-उड़ते उनका जूता,

जा पहुंचा जापान में।

इब्न बतूता खड़े रह गए,

मोची की दुकान में।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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 चिड़िया का घर 

चिड़िया, ओ चिड़िया,

कहाँ है तेरा घर?

उड़-उड़ आती है

जहाँ से फर-फर!

चिड़िया, ओ चिड़िया,

कहाँ है तेरा घर?

उड़-उड़ जाती है-

जहाँ को फर-फर!

वन में खड़ा है जो

बड़ा-सा तरुवर!

उसी पर बना है

खर-पातों वाला घर!

उड़-उड़ आती हूँ

वहीं से फर-फर!

उड़-उड़ जाती हूँ

वहीं को फर-फर

– हरिवंश राय बच्चन

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 आ रही रवि की सवारी

आ रही रवि की सवारी।

नव-किरण का रथ सजा है,

कलि-कुसुम से पथ सजा है,

बादलों-से अनुचरों ने

स्‍वर्ण की पोशाक धारी।

आ रही रवि की सवारी!

विहग, बंदी और चारण,

गा रही है कीर्ति-गायन,

छोड़कर मैदान भागी,

तारकों की फ़ौज सारी।

आ रही रवि की सवारी!

चाहता, उछलूँ विजय कह,

पर ठिठकता देखकर यह-

रात का राजा खड़ा है,

राह में बनकर भिखारी।

आ रही रवि की सवारी!

– हरिवंश राय बच्चन 

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लल्लू जी की पतंग

बातें करे हवा के संग,

लल्लू जी की लाल पतंग।

आसमान में लहर रही है,

एक जगह न ठहर रही है।

इधर भागती उधर भागती

खूब करे मस्ती हुड़दंग।

हरी, गुलाबी, नीली, काली,

की इसने छुट्टी कर डाली।

बीस पतंगें काट चुकी है,

बड़ी बहादुर, बड़ी दबंग।

सभी पतंगों से सुंदर है,

सबकी इस पर टिकी नजर है।

ललचाता है सबको इसका,

अति प्यारा मनमोहक रंग।

– शादाब आलम

___________

वर्षा आई 

रिमझिम रिमझिम वर्षा आई।

ठंडी हवा बही सुखदाई 

बाहर निकला मेंढक गाता।

उसके पास नहीं था छाता 

सर पर बूंदें पड़ी दनादन।

तब घर में लौटा शर्माता 

उसकी माँ ने डांट लगाई

रिमझिम रिमझिम वर्षा आई 

पंचम स्वर में कोयल बोली।

नाच उठी मोरों की टोली 

गधा रंभाया ढेंचू ढेंचू।

सबको सूझी हंसी ठिठोली 

सब बोले अब चुपकर भाई।

रिमझिम रिमझिम वर्षा आई 

गुड़िया बोली – चाचा आओ।

लो, कागज लो, नाव बनाओ 

कंकड़ का नाविक बैठाकर।

फिर पानी में नाव चलाओ 

नाव चली, गुड़िया मुसकाई।

रिमझिम रिमझिम वर्षा आई 

– त्रिलोक सिंह ठकुरेला 

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मेंढक मामा

मेंढक मामा, मेंढक मामा,

क्यों करते हो जी हंगामा?

टर्र-टर्र की सुनकर तान,

फूट गए अपने तो कान।

छोड़ो भी यह गाल फुलाना,

दिन भर राग बेसुरा गाना।

बात हमारी मानो, मामा,

पहले सीखो सारेगामा।

– प्रकाश मनु

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टूट गया किस्से का तार

टूट गया किस्से का तार,

अगड़म-बगड़म गए बाजार,

वहां से लाए मोती चार,

दो मोती थे टूटे-फूटे,

बाकी दो हाथों से छूटे,

अगड़म-बगड़म दोनों रूठे।


आगे आया नया बाजार,

पीं-पीं बाजा, सीटी चार,

लेकर बोले अगड़म-बगड़म,

लिख लो, यह सब रहा उधार,

पैसे कल ले लेना यार।

अगड़म उछल-उछलकर चलता,

बगड़म फिसल-फिसलकर बढ़ता,

पीछे पड़ गए कुत्ते चार।


कूद गए पानी में दोनों,

झटपट पहुंचे नदिया पार,

अगड़म रोता इधर खड़ा है,

बगड़म भी उखड़ा-उखड़ा है,

अब ना पीं-पीं, अब ना बाजा,

फूटा घुटना, फूट गया सिर-

टूट गया किस्से का तार।


– प्रकाश मनु

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 टीचर जी मत पकड़ो कान

टीचर जी!

मत पकड़ो कान,

सर्दी से हो रहा जुकामI

लिखने की नहीं मर्जी है,

सेवा में यह अर्जी है।

ठंडक से ठिठुरे हैं हाथ,

नहीं दे रहे कुछ भी साथI

आसमान में छाए बादल,

भरा हुआ उनमें शीतल जल।

दया करो हो आप महान,

हमको दो छुट्टी का दान।

जल्दी है घर जाने की,

गर्म पकोड़ी खाने की।

जब सूरज उग जाएगा,

समय सुहाना आयेगा।

तब हम आयेंगे स्कूल,

नहीं करेंगे कुछ भी भूलI

– डॉ रूप चंद्र शास्त्री ‘मयंक’

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 बिल्लो रानी कहां चल

बिल्लो रानी, कहां चली,

कहां चली जी, कहां चली?

मैं जाऊंगी बड़े बजार,

खाऊंगी अब टिक्की चार।

सुना, वहां की चाट गजब है,

टिक्की का तो स्वाद अजब है।

लच्छूमल की दही-पापड़ी,

खाऊंगी मैं थोड़ी रबड़ी।

फिर आऊंगी झटपट-झटपट,

आकर दूध पिऊंगी गटगट।


– प्रकाश मनु

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लल्लू जी की पतंग 

बातें करे हवा के संग

लल्लू जी की लाल पतंग।

आसमान में लहर रही है

एक जगह न ठहर रही है।

इधर भागती उधर भागती

खूब करे मस्ती हुड़दंग।

हरी, गुलाबी, नीली, काली

की इसने छुट्टी कर डाली।

बीस पतंगें काट चुकी है

बड़ी बहादुर, बड़ी दबंग।

सभी पतंगों से सुंदर है

सबकी इस पर टिकी नजर है।

ललचाता है सबको इसका

अति प्यारा मनमोहक रंग।


– शादाब आलम 

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 सबसे पहले 


आज उठा मैं सबसे पहले!

सबसे पहले आज सुनूंगा,

हवा सवेरे की चलने पर,

हिल, पत्तों का करना ‘हर-हर’

देखूंगा, पूरब में फैले बादल पीले,

लाल, सुनहले!


आज उठा मैं सबसे पहले!

सबसे पहले आज सुनूंगा,

चिड़िया का डैने फड़का कर

चहक-चहककर उड़ना ‘फर-फर’

देखूंगा, पूरब में फैले बादल पीले,

लाल सुनहले!


आज उठा मैं सबसे पहले!


सबसे पहले आज चुनूंगा,

पौधे-पौधे की डाली पर,

फूल खिले जो सुंदर-सुंदर

देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले।

लाल, सुनहले!


आज उठा मैं सबसे पहले!


सबसे कहता आज फिरूंगा,

कैसे पहला पत्ता डोला,

कैसे पहला पंछी बोला,

कैसे कलियों ने मुंह खोला

कैसे पूरब ने फैलाए बादल पीले।

लाल, सुनहले!

आज उठा मैं सबसे पहले!

– हरिवंश राय बच्चन

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आपको हे लेख पसंद आया होगा तो कमेंट बॉक्समध्ये मुझे जरूर बताना और मुझे आशा आहे की लेख आपको पसंद आया होगा सारी छोटी छोटी कविता कव्हर किया है जिसकी वजह से आपको आपके पढाई मे और जीवन में महत्वपूर्ण लगे|

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