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आदर्श बदला स्वाध्याय - Adarsh jamadandi | आदर्श बदला कहानी [ 12th कृती और स्वाध्याय ]

आदर्श बदला स्वाध्याय - Adarsh jamadandi 

आदर्श बदला स्वाध्याय - Adarsh jamadandi | आदर्श बदला कहानी [ 12th कृती और स्वाध्याय ]

कृति पूर्ण कीजिए :

आकलन | Q 1 | Page 21
1) साधुओं की एक स्वाभाविक विशेषता - ____________
SOLUTION
साधुओं की एक स्वाभाविक विशेषता - एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहना और भजन तथा भक्तिगीत गाते-बजाते रहना।

2) आगरा शहर का प्रभातकालीन वातावरण - ____________
SOLUTION
(१) फूल झूम रहे थे
(२) पक्षी मीठे गीत गा रहे थे
(३) पेड़ों की शाखाएँ खेलती थीं
(४) पत्ते तालियाँ बजाते थे।

3) साधुओं की मंडली आगरा शहर में यह गीत गा रही थी -  ____________
SOLUTION
सुमर-सुमर भगवान को,
मूरख मत खाली छोड़ इस मन को।

लिंग बदलिए :

शब्द संपदा | Q 1 | Page 21
1) साधु
SOLUTION
साधु - साध्वी

2) नवयुवक
SOLUTION
नवयुवक - नवयुवती

3) महाराज
SOLUTION
महाराज - महारानी

4) दास
SOLUTION
दास - दासी

अभिव्यक्त - सच हम नहीं सच तुम नहीं 

अभिव्यक्त | Q 1 | Page 21
1) ‘मनुष्य जीवन मेंअहिंसा का महत्त्व’, इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
SOLUTION
हिंसा क्रूरता और निर्यात की निशानी है। इससे किसी का भला नहीं हो सकता। इस संसार के सभी जीव ईश्वर की संतान हैं और समान हैं। सृष्टि में सबको जीने का अधिकार है। कोई कितना भी शक्तिमान क्यों न हो, किसी को उससे उसका जीवन छीनने का अधिकार नहीं है। जब कोई किसी को जीवन दे नहीं सकता तब वह किसी का जीवन ले भी नहीं सकता। बड़े-बड़े मनुष्य और महापुरुषों ने अहिंसा को ही धर्म कहा है - अहिंसा परमो धर्म। अहिंसा का अस्त्र सबसे बड़ा माना जाता है। राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने अहिंसा के बल पर शक्तिशाली अंग्रेज सरकार को झुका दिया था और अंग्रेज सरकार देश को आजाद करने पर विवश हो गई थी। जीवन का मूलमंत्र 'जियो और जीने दो है। किसी के प्रति ईर्ष्या की भावना रखना या किसी का नुकसान करना भी एक प्रकार की हिंसा है। इससे हमें बचना चाहिए।

2) सच्चा कलाकार वह होता हैजो दूसरों की कला का सम्मान करता है’, इस कथन पर अपना मत व्यक्त कीजिए।
SOLUTION
कलाकार को कोई कला सीखने के लिए गुरु के सान्निध्य में रह कर वर्षों तक तपस्या करनी पड़ती है। कला की छोटी छोटी बारीक बातों की जानकारी करनी पड़ती है। इसके साथ ही निरंतर रियाज करना पड़ता है। गुरु से कला की जानकारियां प्राप्त करते-करते अपनी कला में वह प्रवेश होता है। सच्चा कलाकार किसी कला को सीखने की प्रक्रिया में होने वाली कठिनाइयों से परिचित होता है। इसलिए उसके दिल में अन्य कलाकारों के लिए सदा सम्मान की भावना होती । वह छोटे-बड़े हर कलाकार को समान समझता है और उनकी कला का सम्मान करता है। सच्चे कलाकार का यही धर्म है। इससे कला को प्रोत्साहन मिलता है और वह फूलती-फलती है।

3) ‘आदर्श बदला’ कहानी केशीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
SOLUTION
अपने पिता को मृत्युदंड दिए जाने पर बैजू विक्षिप्त हो गया था। और अपनी कुटिया में विलाप कर रहा था। उस समय बाबा हरिदास ने उसकी कुटिया में आकर उसे ढाढ़स बँधाया था। तब बालक बैजू ने बाबा को बताया था कि उसे अब बदले की भूख है। वे उसकी इस भूख को मिटा दें। बाबा हरिदास ने उसे वचन दिया था कि वे उसे ऐसा हथियार देंगे, जिससे वह अपने पिता की मौत का बदला ले सकेगा।
बाबा हरिदास ने बारह वर्षों तक बैजू को संगीत की हर प्रकार की बारीकियाँ सिखाकर उसे पूर्ण गंधर्व के रूप में तैयार कर दिया। मगर इसके साथ ही उन्होंने उससे यह वचन भी ले लिया कि वह इस राग विद्या से किसी को हानि न पहुँचाएगा।

इसके बाद वह दिन भी आया जब बैजू आगरा सड़कों पर गाता हुआ निकला और उसके पीछे उसकी कला के प्रशंसकों की अपार भीड़ थी। आगरा में गाने के नियम के अनुसार उसे बादशाह के समक्ष पेश किया गया और शर्त के अनुसार तानसेन से उसकी संगीत प्रतियोगिता हुई, जिसमें उसने तानसेन को बुरी तरह परास्त कर दिया। तानसेन बैजू बावरा के पैरों पर गिरकर अपनी जान की भीख माँगने लगा। इस मौके पर बैजू बावरा उससे अपने पिता की मौत का बदला लेकर उसे प्राणदंड दिलवा सकता था। 

पर उसने ऐसा नहीं किया। बैजू ने तानसेन की जान बख्श दी। उसने उससे केवल इस निष्ठुर नियम को उड़वा देने के लिए कहा, जिसके अनुसार किसी को आगरे की सीमाओं में गाने और तानसेन की जोड़ का न होने पर मरवा दिया जाता था। इस तरह बैजू बावरा ने तानसेन का गर्व नष्ट कर उसे मुँह की खिलाकर उससे अनोखा बदला लेकर उसे श्रीहीन कर दिया था। यह अपनी तरह का आदर्श बदला था। समूची कहानी इस बदले के आसपास घूमती है। इसलिए 'आदर्श बदला' शीर्षक इस कहानी के उपयुक्त है।

4) ‘बैजूबावरा संगीत का सच्चा पुजारी है’, इस विचार को स्पष्ट कीजिए 
SOLUTION
सच्चा कलाकार उसे कहते हैं, जिसे अपनी कला से सच्चा लगाव हो। वह अपने गुरु की कही हुई बातों पर अमल करे तथा गुरु से विवाद न करे। इसके अलावा उसे अपनी कला पर अहंकार न हो। बैजू बावरा ने बारह वर्ष तक बाबा हरिदास से संगीत सीखने की कठिन तपस्या की थी। वह उनका एक आज्ञाकारी शिष्य था। उसकी संगीत शिक्षा पूरी हो जाने के बाद बाबा हरिदास ने जब उससे यह प्रतिज्ञा करवाई कि वह इस राग विद्या से किसी को हानि नहीं पहुँचाएगा, तो भी उसने रक्त का घूँट पी कर इस गुरु आदेश को स्वीकार कर लिया था, जबकि उसे मालूम था कि इससे उसके हाथ में आई हुई प्रतिहिंसा की छुरी कुंद कर दी गई थी। फिर भी गुरु के सामने उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।

बैजू बावरा की संगीत कला की धाक दूर-दूर तक फैल गई थी। उसके संगीत में जादू का असर था। बैजू बावरा का संगीत ज्ञान पर तानसेन की तरह कोई अधिकार नहीं था। बल्कि इसके विपरीत उसके हृदय में दया की भावना थी। गानयुद्ध में तानसेन को पराजित करने पर भी वह अपनी जीत और संगीत का प्रदर्शन नहीं करता। बल्कि वह तानसेन को जीवनदान दे देता है। वह उससे केवल यह माँग करता है कि वह इस नियम को खत्म करवा दे कि जो कोई आगरा की सीमा के अंदर गाए, वह अगर तानसेन की जोड़ का न हो, तो मरवा दिया जाए। उसकी इस मांग में भी गीत-संगीत की रक्षा करने की भावना निहित है।
इस प्रकार इसमें कोई संदेह नहीं है कि बैजू बावरा संगीत का सच्चा प्यार था।

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान - सच हम नहीं सच तुम नहीं 

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 22
1) सुदर्शन जी का मूल नाम : ____________
SOLUTION
सुदर्शन जी का मूल नाम : सुदर्शन जी का मूल नाम बद्रीनाथ है।

2) सुदर्शन ने इस लेखक की लेखन परंपरा को आगे बढ़ाया है : ____________
SOLUTION
सुदर्शन ने इस लेखक की लेखन परंपरा को आगे बढ़ाया है : सुदर्शन ने मुंशी प्रेमचंद की लेखन परंपरा को आगे बढ़ाया है।

Balbharati solutions for Hindi - Yuvakbharati 12th Standard HSC Maharashtra State Board chapter 4 - आदर्श बदला [Latest edition] ..

आदर्श बदला स्वाध्याय - Adarsh jamadandi 

लेखक परिचय ः सुदर्शन जी का जन्म २९ मई १8९5 को सियालकोट में हुआ । आपका वास्तविक नाम बदरीनाथ है ।  आपने प्रेमचंद की लेखन परंपरा को आगे बढ़ाया है । साहित्य को लेकर आपका दृष्टिकोण सुधारवादी रहा । आपकी रचनाएँ आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को रेखांकित करती हैं । साहित्य सृजन के अतिरिक्त आपने हिंदी फिल्मों की पटकथाएँ और गीत भी  लिखे । ‘हार की जीत’ आपकी प्रथम कहानी है और हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती है । आपकी कहानियों की भाषा  सरल, पात्रानुकूल तथा प्रभावोत्पादक है । आपकी कहानियाँ घटनाप्रधान हैं । रचनाओं में प्रयुक्त मुहावरे आपकी साहित्यिक  भाषा को जीवंतता और कथ्य को प्रखरता प्रदान करते हैं । आपका निधन ९ मार्च १९६७ में हुआ ।

प्रमुख कृतियाँ ः ‘पुष्पलता’, ‘सुदर्शन सुधा’, ‘तीर्थयात्रा’, ‘पनघट’ (कहानी संग्रह), ‘सिकंदर’, ‘भाग्यचक्र’ (नाटक)  ‘भागवती’ (उपन्यास), ‘आनररी मजिस्ट्रेट’ (प्रहसन) आदि ।

विधा परिचय ः कहानी भारतीय साहित्य की प्राचीन विधा है । कहानी जीवन का मार्गदर्शन करती है । जीवन के प्रसंगों को  उद्घाटित करती है । मन को बहलाती है । अत: कहानी विधा का विभिन्न उद्देश्यों के अनुसार वर्गीकरण किया जाता है ।  सरल-सीधी भाषा, मुहावरों का सटीक प्रयोग, प्रवहमान शैली कहानी की प्रभावोत्पादकता को वृद्‌धिंगत करती है । 

पाठ परिचय ः प्रस्तुत पाठ में लेखक ने बदला शब्द को अलग ढंग से व्याख्यायित करने का प्रयास किया है । यदि वह बदला  किसी के मन में उत्पन्न हिंसा को समाप्त कर उसे जीवन का सम्मान करने की सीख देता है तो वह आदर्श बदला कहलाता  है । बचपन में बैजू अपने पिता को भजन गाने के कारण तानसेन की क्रूरता का शिकार होता हुआ देखता है परंतु वही बैजू  तानसेन को संगीत प्रतियोगिता में पराजित कर उसे जीवनदान देता है और संगीत का सच्चा साधक सिद्ध होता है । कलाकार  को अपनी कला पर अहंकार नहीं करना चाहिए । कला का सम्मान करना कलाकार का परम कर्तव्य होता है ।

आदर्श बदला स्वाध्याय - Adarsh jamadandi 

    प्रभात का समय था, आसमान से बरसती हुई प्रकाश  की किरणें संसार पर नवीन जीवन की वर्षा कर रही थीं ।  बारह घंटों के लगातार संग्राम के बाद प्रकाश ने अँधेरे पर  विजय पाई थी । इस खुशी में फूल झूम रहे थे, पक्षी मीठे  गीत गा रहे थे, पेड़ों की शाखाएँ खेलती थीं और पत्ते तालियाँ बजाते थे । चारों तरफ खुशियाँ झूमती थीं । चारों  तरफ गीत गूँजते थे । इतने में साधुओं की एक मंडली शहर  के अंदर दाखिल हुई । उनका खयाल था- मन बड़ा चंचल  है । अगर इसे काम न हो, तो इधर-उधर भटकने लगता है  और अपने स्वामी को विनाश की खाई में गिराकर नष्ट कर  डालता है । इसे भक्ति की जंजीरों से जकड़ देना चाहिए ।  साधु गाते थे- सुमर-सुमर भगवान को, मूरख मत खाली छोड़ इस मन को । जब संसार को त्याग चुके थे, उन्हें सुर-ताल की क्या परवाह थी । कोई ऊँचे स्वर में गाता था, कोई मुँह में  गुनगुनाता था । और लोग क्या कहते हैं, इन्हें इसकी जरा भी  चिंता न थी । 

ये अपने राग में मगन थे कि सिपाहियों ने  आकर घेर लिया और हथकड़ियाँ लगाकर अकबर बादशाह  के दरबार को ले चले । यह वह समय था जब भारत में अकबर की तूती  बोलती थी और उसके मशहूर रागी तानसेन ने यह कानून  बनवा दिया था कि जो आदमी रागविद्या में उसकी बराबरी  न कर सके, वह आगरे की सीमा में गीत न गाए और जो  गाए, उसे मौत की सजा दी जाए । बेचारे बनवासी साधुओं  को पता नहीं था परंतु अज्ञान भी अपराध है । मुकदमा  दरबार में पेश हुआ । तानसेन ने रागविद्या के कुछ प्रश्न किए । साधु उत्तर में मुँह ताकने लगे । अकबर के होंठ हिले  और सभी साधु तानसेन की दया पर छोड़ दिए गए । दया निर्बल थी, वह इतना भार सहन न कर सकी ।  मृत्युदंड की आज्ञा हुई । केवल एक दस वर्ष का बच्चा छोड़ा गया - बच्चा है, इसका दोष नहीं । यदि है भी तो  क्षमा के योग्य है । बच्चा रोता हुआ आगरे के बाजारों से निकला और  जंगल में जाकर अपनी कुटिया में रोने-तड़पने लगा । वह  बार-बार पुकारता था - ‘‘बाबा ! तू कहाँ है? अब कौन

मुझे प्यार करेगा? कौन मुझे कहानियाँ सुनाएगा? लोग  आगरे की तारीफ करते हैं, मगर इसने मुझे तो बरबाद कर दिया । इसने मेरा बाबा छीन लिया और मुझे अनाथ बनाकर  छोड़ दिया । बाबा ! तू कहा करता था कि संसार में  चप्पे-चप्पे पर दलदलें हैं और चप्पे-चप्पे पर काँटों की  झाड़ियाँ हैं । अब कौन मुझे इन झाड़ियों से बचाएगा? कौन  मुझे इन दलदलों से निकालेगा? कौन मुझे सीधा रास्ता बताएगा? कौन मुझे मेरी मंजिल का पता देगा?’’ इन्हीं विचारों में डूबा हुआ बच्चा देर तक रोता रहा ।  इतने में खड़ाऊँ पहने हुए, हाथ में माला लिए हुए, रामनाम का जप करते हुए बाबा हरिदास कुटिया के अंदर आए और  बोले - ‘‘बेटा ! शांति करो । शांति करो ।

’’ बैजू उठा और हरिदास जी के चरणों से लिपट गया ।  वह बिलख-बिलखकर रोता था और कहता था -  ‘‘महाराज ! मेरे साथ अन्याय हुआ है । मुझपर वज्र गिरा  है ! मेरा संसार उजड़ गया है । मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?’’ हरिदास बोले - ‘‘शांति, शांति ।’’ बैजू - ‘‘महाराज ! तानसेन ने मुझे तबाह कर दिया !  उसने मेरा संसार सूना कर दिया !’’ हरिदास - ‘‘शांति, शांति ।’’बैजू ने हरिदास के चरणों से और भी लिपटकर  कहा - ‘‘महाराज ! शांति जा चुकी । अब मुझे बदले की  भूख है । अब मुझे प्रतिकार की प्यास है । मेरी प्यास  बुझाइए ।’’ हरिदास ने फिर कहा - ‘‘बेटा ! शांति, शांति !’’ बैजू ने करुणा और क्रोध की आँखों से बाबा जी की  तरफ देखा । उन आँखों में आँसू थे और आहें थीं और आग  थी ।

 जो काम जबान नहीं कर सकती, उसे आँखें कर देती  हैं, और जो काम आँखें भी नहीं कर सकतीं उसे आँखों के  आँसू कर देते हैं । बैजू ने ये दो आखिरी हथियार चलाए और  सिर झुकाकर खड़ा हो गया । हरिदास के धीरज की दीवार आँसुओं की बौछार न  सह सकी और काँपकर गिर गई । उन्होंने बैजू को उठाकर  गले से लगाया और कहा - ‘‘मैं तुझे वह हथियार दूँगा,  जिससे तू अपने पिता की मौत का बदला ले सकेगा ।’’ बैजू हैरान हुआ - बैजू खुश हुआ - बैजू उछल  पड़ा । उसने कहा - ‘‘बाबा ! आपने मुझे खरीद लिया ।  आपने मुझे बचा लिया । अब मैं आपका सेवक हूँ ।’’ हरिदास - ‘‘मगर तुझे बारह बरस तक तपस्या करनी  होगी - कठोर तपस्या - भयंकर तपस्या ।’’
बैजू - ‘‘महाराज, आप बारह बरस कहते हैं । 

 मैं बारह जीवन देने को तैयार हूँ । मैं तपस्या करूँगा, मैं दुख  झेलूँगा, मैं मुसीबतें उठाऊँगा । मैं अपने जीवन का  एक-एक क्षण आपको भेंट कर दूँगा । मगर क्या इसके बाद  मुझे वह हथियार मिल जाएगा, जिससे मैं अपने बाप की  मौत का बदला ले सकूँ?’’ हरिदास - ‘‘हाँ ! मिल जाएगा ।’’ बैजू - ‘‘तो मैं आज से आपका दास हूँ । आप आज्ञा दें, मैं आपकी हर आज्ञा का सिर और सिर के साथ दिल  झुकाकर पालन करूँगा ।’’  ऊपर की घटना को बारह बरस बीत गए । जगत में  बहुत-से परिवर्तन हो गए । कई बस्तियाँ उजड़ गईं । कई  वन बस गए । बूढ़े मर गए । जो जवान थे; उनके बाल सफेद  हो गए । 

अब बैजू बावरा जवान था और रागविद्या में  दिन ब-दिन आगे बढ़ रहा था । उसके स्वर में जादू था  और तान में एक आश्चर्यमयी मोहिनी थी । गाता था तो  पत्थर तक पिघल जाते थे और पशु-पंछी तक मुग्ध हो जाते  थे । लोग सुनते थे और झूमते थे तथा वाह-वाह करते थे ।  हवा रुक जाती थी । एक समाँ बँध जाता था । एक दिन हरिदास ने हँसकर कहा - ‘‘वत्स ! मेरे पास  जो कुछ था, वह मैंने तुझे दे डाला । अब तू पूर्ण गंधर्व हो  गया है । अब मेरे पास और कुछ नहीं, जो तुझे दूँ ।’’ बैजू हाथ बाँधकर खड़ा हो गया । कृतज्ञता का भाव  आँसुओं के रूप में बह निकला । चरणों पर सिर रखकर  बोला - ‘‘महाराज ! आपका उपकार जन्म भर सिर से न  उतरेगा ।’’ हरिदास सिर हिलाकर बोले - ‘‘यह नहीं बेटा ! कुछ  और कहो । मैं तुम्हारे मुँह से कुछ और सुनना चाहता हूँ ।’’ बैजू - ‘‘आज्ञा कीजिए ।’’ हरिदास - ‘‘तुम पहले प्रतिज्ञा करो ।’’ बैजू ने बिना सोच विचार किए कह दिया-  ‘‘मैं प्रतिज्ञा करता हूँकि.....’’ हरिदास ने वाक्य को पूरा किया - ‘‘इस रागविद्या से  किसी को हानि न पहुँचाऊँगा ।’’

बैजू का लहू सूख गया । उसके पैर लड़खड़ाने लगे ।  सफलता के बाग परे भागते हुए दिखाई दिए । बारह वर्ष की  तपस्या पर एक क्षण में पानी फिर गया । प्रतिहिंसा की छुरी  हाथ आई तो गुरु ने प्रतिज्ञा लेकर कुंद कर दी । बैजू ने होंठ  काटे, दाँत पीसे और रक्त का घूँट पीकर रह गया । मगर गुरु के सामने उसके मुँह से एक शब्द भी न निकला । गुरु गुरु था, शिष्य शिष्य था । शिष्य गुरु से विवाद नहीं करता । कुछ दिन बाद एक सुंदर नवयुवक साधु आगरे के  बाजारों में गाता हुआ जा रहा था । लोगों ने समझा, इसकी  भी मौत आ गई है । वे उठे कि उसे नगर की रीति की सूचना  दे दें, मगर निकट पहुँचने से पहले ही मुग्ध होकर  अपने-आपको भूल गए और किसी को साहस न हुआ कि
उससे कुछ कहे । दम-के-दम में यह समाचार नगर में जंगल  की आग के समान फैल गया कि एक साधु रागी आया है,  जो बाजारों में गा रहा है ।

 सिपाहियों ने हथकड़ियाँ सँभालीं  और पकड़ने के लिए साधु की ओर दौड़े परंतु पास आना था  कि रंग पलट गया । साधु के मुखमंडल से तेज की किरणें  फूट रही थीं, जिनमें जादू था, मोहिनी थी और मुग्ध करने  की शक्ति थी । सिपाहियों को न अपनी सुध रही, न  हथकड़ियों की, न अपने बल की, न अपने कर्तव्य की, न  बादशाह की, न बादशाह के हुक्म की । वे आश्चर्य से उसके  मुख की ओर देखने लगे, जहाँ सरस्वती का वास था और  जहाँ से संगीत की मधुर ध्वनि की धारा बह रही थी । साधु  मस्त था, सुनने वाले मस्त थे । जमीन-आसमान मस्त थे ।  गाते-गाते साधु धीरे-धीरे चलता जाता था और श्रोताओं  का समूह भी धीरे-धीरे चलता जाता था । ऐसा मालूम होता  था, जैसे एक समुद्र है जिसे नवयुवक साधु आवाजों की  जंजीरों से खींच रहा है और संकेत से अपने साथ-साथ आने की प्रेरणा कर रहा है । 

 मुग्ध जनसमुदाय चलता गया, चलता गया, चलता  गया । पता नहीं किधर को? पता नहीं कितनी देर? एकाएक  गाना बंद हो गया । जादू का प्रभाव टूटा तो लोगों ने देखा  कि वे तानसेन के महल के सामने खड़े हैं । उन्होंने दुख और  पश्चात्ताप से हाथ मले और सोचा- यह हम कहाँ आ गए?  साधु अज्ञान में ही मौत के द्वार पर आ पहुँचा था ।  भोली-भाली चिड़िया अपने-आप अजगर के मुँह में आ  फँसी थी और अजगर के दिल में जरा भी दया न थी ।  तानसेन बाहर निकला । वहाँ लोगों को देखकर वह  हैरान हुआ और फिर सब कुछ समझकर नवयुवक से  बोला- ‘‘तो शायद आपके सिर पर मौत सवार है?’’ नवयुवक साधु मुस्कुराया- ‘‘जी हाँ । मैं आपके साथ गानविद्या पर चर्चा करना चाहता हूँ ।’’  तानसेन ने बेपरवाही से उत्तर दिया- ‘‘ अच्छा ! मगर  आप नियम जानते हैं न? नियम कड़ा है और मेरे दिल में  दया नहीं है । मेरी आँखें दूसरों की मौत को देखने के लिए  हर समय तैयार हैं ।’’ नवयुवक - ‘‘और मेरे दिल में जीवन  का मोह नहीं है । मैं मरने के लिए हर समय तैयार हूँ ।’’ इसी समय सिपाहियों को अपनी हथकड़ियों का ध्यान  आया । 

झंकारते हुए आगे बढ़े और उन्होंने नवयुवक साधु  के हाथों में हथकड़ियाँ पहना दीं । भक्ति का प्रभाव टूट  गया । श्रद्धा के भाव पकड़े जाने के भय से उड़ गए और  लोग इधर-उधर भागने लगे । सिपाही कोड़े बरसाने लगे  और लोगों के तितर-बितर हो जाने के बाद नवयुवक साधु  को दरबार की ओर ले चले । दरबार की ओर से शर्तें सुनाई  गईं- ‘‘कल प्रात:काल नगर के बाहर वन में तुम दोनों का  गानयुद्ध होगा । अगर तुम हार गए, तो तुम्हें मार डालने  तक का तानसेन को पूर्ण अधिकार होगा और अगर तुमने  उसे हरा दिया तो उसका जीवन तुम्हारे हाथ में होगा ।’’ नौजवान साधु ने शर्तें मंजूर कर लीं । दरबार ने आज्ञा दी कि कल प्रात:काल तक सिपाहियों की रक्षा में रहो । यह नौजवान साधु बैजू बावरा था ।

 सूरज भगवान की पहली किरण ने आगरे के लोगों को  आगरे से बाहर जाते देखा । साधु की प्रार्थना पर सर्वसाधारण को भी उसके जीवन और मृत्यु का तमाशा देखने की आज्ञा दे दी गई थी । साधु की विद्वत्ता की धाक दूर-दूर तक  फैल गई थी । जो कभी अकबर की सवारी देखने को भी घर  से बाहर आना पसंद नहीं करते थे, आज वे भी नई पगड़ियाँ बाँधकर निकल रहे थे । ऐसा जान पड़ता था कि आज नगर से बाहर वन में  नया नगर बस जाने को है- वहाँ, जहाँ कनातें लगी थीं, जहाँचाँदनियाँतनी थीं, जहाँ कुर्सियों की कतारें सजी थीं । इधर  जनता बढ़ रही थी और उद्‌विग्नता और अधीरता से गानयुद्ध के समय की प्रतीक्षा कर रही थी । बालक को  प्रात:काल मिठाई मिलने की आशा दिलाई जाए तो वह रात 


को कई बार उठ-उठकर देखता है कि अभी सूरज निकला  है या नहीं? उसके लिए समय रुक जाता है । उसके हाथ से  धीरज छूट जाता है । वह व्याकुल हो जाता है । समय हो गया । लोगों ने आँख उठाकर देखा । अकबर  सिंहासन पर था, साथ ही नीचे की तरफ तानसेन बैठा था  और सामने फर्श पर नवयुवक बैजू बावरा दिखाई देता था।  उसके मुँह पर तेज था, उसकी आँखों में निर्भयता थी ।अकबर ने घंटी बजाई और तानसेन ने कुछ सवाल 
संगीतविद्या के संबंध में बैजू बावरा से पूछे । बैजू ने उचित उत्तर दिए और लोगों ने हर्ष से तालियाँ पीट दीं । हर मुँह से  ‘‘जय हो, जय हो’’, ‘‘बलिहारी, बलिहारी’’ की ध्वनिनिकलने लगी ! इसके बाद बैजू बावरा ने सितार हाथ में ली और जब  उसके पर्दों को हिलाया तो जनता ब्रह्‌मानंद में लीन हो  गई । पेड़ों के पत्तेतक नि:शब्द हो गए । वायु रुक गई ।  

सुनने वाले मंत्रमुग्धवत सुधिहीन हुए सिर हिलाने लगे । बैजू  बावरे की अँगुलियाँसितार पर दौड़ रही थीं । उन तारों पर  रागविद्या निछावर हो रही थी और लोगों के मन उछल रहे थे, झूम रहे थे, थिरक रहे थे । ऐसा लगता था कि सारे विश्व की मस्ती वहीं आ गई है ।लोगों ने देखा और हैरान रह गए । कुछ हरिण छलाँगें  मारते हुए आए और बैजू बावरा के पास खड़े हो गए । बैजू  बावरा सितार बजाता रहा, बजाता रहा, बजाता रहा । वे  हरिण सुनते रहे, सुनते रहे, सुनते रहे । और दर्शक यह  असाधारण दृश्य देखते रहे, देखते रहे, देखते रहे ।  हरिण मस्त और बेसुध थे । बैजू बावरा ने सितार हाथ से रख दी और अपने गले से फूलमालाएँ उतारकर उन्हें  पहना दीं । फूलों के स्पर्श से हरिणों को सुध आई और वे  चौकड़ी भरते हुए गायब हो गए ! बैजू ने कहा- ‘‘तानसेन !  मेरी फूलमालाएँ यहाँ मँगवा दें, मैं तब जानूँकि आप  रागविद्या जानते हैं ।’’ 

 तानसेन सितार हाथ में लेकर उसे अपनी पूर्ण प्रवीणता  के साथ बजाने लगा । ऐसी अच्छी सितार, ऐसी एकाग्रता  के साथ उसने अपने जीवन भर में कभी न बजाई थी । सितार  के साथ वह आप सितार बन गया और पसीना-पसीना हो  गया । उसको अपने तन की सुधि न थी और सितार के बिना  संसार में उसके लिए और कुछ न था । आज उसने वह  बजाया, जो कभी न बजाया था । आज उसने वह बजाया  जो कभी न बजा सकता था । यह सितार की बाजी न थी,  यह जीवन और मृत्यु की बाजी थी । आज तक उसने अनाड़ी  देखे थे । आज उसके सामने एक उस्ताद बैठा था । कितना  ऊँचा ! कितना गहरा !! कितना महान !!! आज वह  अपनी पूरी कला दिखा देना चाहता था । आज वह किसी  तरह भी जीतना चाहता था । आज वह किसी भी तरह जीते  रहना चाहता था । बहुत समय बीत गया । सितार बजती रही । अँगुलियाँ

दुखने लगीं । मगर लोगों ने आज तानसेन को पसंद न  किया । सूरज और जुगनू का मुकाबला ही क्या? आज से  पहले उन्होंने जुगनू देखे थे । आज उन्होंने सूरज देख लिया  था । बहुत चेष्टा करने पर भी जब कोई हरिण न आया तो  तानसेन की आँखों के सामने मौत नाचने लगी । देह  पसीना-पसीना हो गई । लज्जा ने मुखमंडल लाल कर दिया  था । आखिर खिसियाना होकर बोला- ‘‘वे हरिण अचानक  इधर आ निकले थे, राग की तासीर से न आए थे । हिम्मत है तो अब दोबारा बुलाकर दिखाओ ।’’ बैजू बावरा मुस्कुराया और धीरे से बोला- ‘‘बहुत अच्छा ! दोबारा बुलाकर दिखा देता हूँ ।’’ यह कहकर उसने फिर सितार पकड़ ली । एक बार  फिर संगीतलहरी वायुमंडल में लहराने लगी । फिर सुनने वाले संगीतसागर की तरंगों में डूबने लगे, हरिण बैजू बावरा  के पास फिर आए; वे ही हरिण जिनकी गरदन में फूलमालाएँ पड़ी हुई थीं और जो राग की सुरीली ध्वनि के जादू से बुलाए  गए थे । बैजू बावरा ने मालाएँ उतार लीं और हरिण कूदते  हुए जिधर से आए थे, उधर को चले गए ।

अकबर का तानसेन के प्रति अगाध प्रेम था । उसकी  मृत्युनिकट देखी तो उनका कंठ भर आया परंतु प्रतिज्ञा हो  चुकी थी । वे विवश होकर उठे और संक्षेप में निर्णय सुना  दिया- ‘‘बैजू बावरा जीत गया, तानसेन हार गया । अब  तानसेन की जान बैजू बावरा के हाथ में है ।’’  तानसेन काँपता हुआ उठा, काँपता हुआ आगे बढ़ा  और काँपता हुआ बैजू बावरा के पाँव में गिर पड़ा । वह  जिसने अपने जीवन में किसी पर दया न की थी, इस समय  दया के लिए गिड़गिड़ा रहा था और कह रहा था- ‘‘मेरे  प्राण न लो !’’ बैजू बावरा ने कहा- ‘‘मुझे तुम्हारे प्राण लेने की चाह  नहीं । तुम इस निष्ठुर नियम को उड़वा दो कि जो कोई  आगरे की सीमाओं के अंदर गाए, अगर तानसेन के जोड़  का न हो तो मरवा दिया जाए ।’’ 

अकबर ने अधीर होकर कहा- ‘‘यह नियम अभी,  इसी क्षण से उड़ा दिया गया ।’’ तानसेन बैजू बावरा के  चरणों में गिर गया और दीनता से कहने लगा- ‘‘मैं यह  उपकार जीवन भर न भूलूँगा ।’’ बैजू बावरा ने जवाब दिया- ‘‘बारह बरस पहले की  बात है, आपने एक बच्चे की जान बख्शी थी । आज उस 
बच्चे ने आपकी जान बख्शी है ।’’ तानसेन हैरान होकर  देखने लगा । फिर थोड़ी देर बाद उसे पुरानी, एक भूली हुई,  एक धुँधली-सी बात याद आ गई । 
(‘सुदर्शन की श्रेष्ठ कहानियाँ’ संग्रह से)

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