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ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय | ojon vighatan ka sankat svaadhyaay [ 12th कृती और स्वाध्याय ]

ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय | ojon vighatan ka sankat svaadhyaay 

दोस्तों आज की एक धमाकेदार पोस्ट में हम देखने जा रहे हैं ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय कक्षा  12वीं हमने इसी तरीके से कक्षा बारहवीं हिंदी और मराठी के सभी प्रश्न उत्तर हमारी निर्मल एकेडमी ऑफिशियल वेबसाइट पर डाली है आपको अगर इसी प्रकार के प्रश्न उत्तर उनकी जरूरत है तो हमारी इस निर्माण अकैडमी को जरूर भेज दें और आपके स्टडी में इस वेबसाइट को शामिल कर लें इससे आपको 12वीं बोर्ड की कक्षा में ज्यादा से ज्यादा मार्ग मिलने की क्षमता बढ़ जाएगी

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ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय | ojon vighatan ka sankat svaadhyaay [ 12th कृती और स्वाध्याय ]

लिखिए :

आकलन | Q 1 | Page 55
1) ओजोन गैस की विशेषताएँ :
(१) __________________
(२) __________________

SOLUTION
(१) ओजोन गैस नीले रंग की होती है।
(२) यह प्रकृति में तीक्ष्ण और विषैली होती है और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

2) ओजोन विघटन के दुष्प्रभाव :
(१) __________________
(२) __________________
SOLUTION
(१) ओजोन विघटन के कारण अंतरिक्ष से आने वाली पराबैंगनी किरणों से धरती के तापमान में वृद्धि होगी।
(२) अनेकानेक प्रकार की त्वचा संबंधी व्याधियाँ फैलेंगी। त्वचा के कैंसर के रोगियों की संख्या लाखों में होगी।

कृदंत बनाइए :

शब्द संपदा | Q 1 | Page 55
1) कहना - ______
SOLUTION
कहना - कथन

2) बैठना - ______
SOLUTION
बैठना - बैठक

3) लगना - ______
SOLUTION
लगना - लगाव

4) छीजना - ______
SOLUTION
छीजना - छीजन

ओजोन विघटन का संकट अभिव्यक्त 

अभिव्यक्त | Q 1 | Page 55
1) भौतिक विकास केकारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं केबारेमेंअपने विचार व्यक्त कीजिए।
SOLUTION
एक समय था जब धरती का बहुत बड़ा भाग घने जंगलों से ढका हुआ था। परंतु समय के साथ बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगिक विकास के कारण वनों को बहुत तेजी से काटा गया। हजारों-लाखों वर्षों से संचित वन रूपी संपत्ति को हमने समाप्त कर दिया है। आए दिन बढ़ते उद्योग-धंधों के परिणाम- स्वरूप वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें बढ़ती जा रही हैं। ऑक्सीजन की कमी होने लगी है। हवा में अवांछित गैसों की उपस्थिति से मनुष्यों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे दमा, खाँसी, त्वचा संबंधी रोग उत्पन्न हो रहे हैं। वायु प्रदूषण के कारण जीन परिवर्तन, आनुवंशिक रोग तथा त्वचा के कैंसर के खतरे बढ़ रहे हैं। वायु प्रदूषण से अम्लीय वर्षा के खतरे बढ़े हैं, क्योंकि बारिश के पानी में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, जैसी जहरीली गैसों के घुलने की संभावना बढ़ी है।

2) ‘पर्यावरण रक्षा मेंहमारा योगदान’, इस विषय पर लिखिए ।
SOLUTION
आज पूरी दुनिया पर्यावरण प्रदूषण से पीड़ित है। पर्यावरण प्रदूषण अर्थात हवा में ऐसी अवांछित गैसों, धूल के कणों आदि की उपस्थिति, जो लोगों तथा प्रकृति दोनों के लिए खतरे का कारण बन जाए। वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआँ तथा रसायन। पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान देते हुए हमें प्लास्टिक का प्रयोग कम-से-कम करना चाहिए। रिसाइकल किए जा सकने वाली चीजों को फेंक नहीं देना चाहिए। जैसे अखबार, कागज, गत्ते, काँच आदि। पेट्रोल, डीजल आदि के उपयोग में कमी करनी चाहिए। पर्यावरण की रक्षा करना हम सबका कर्तव्य है। पर्यावरण है तो हमारा जीवन है।

3) ओजोन विघटन संकट सेबचनेके लिए किए गए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को संक्षेप में लिखिए।
SOLUTION
ओजोन विघटन संकट पर विचार करने के लिए अनेक देशों की पहली बैठक 1985 में विमान में हुई। बाद में सितंबर 1987 में कनाडा के मांट्रियल शहर में बैठक हुई, जिसमें दुनिया के 48 देशों ने भाग लिया था। इसके तहत यह प्रावधान रखा गया कि 1995 तक सभी देश सी एफ सी की खपत में 50 प्रतिशत की कटौती तथा 1997 तक 85 प्रतिशत की कटौती करेंगे। सन 2010 तक सभी देश सी एफ सी का इस्तेमाल एकदम बंद कर देंगे। इस दौरान विकसित देश नए प्रशीतकों की खोज में विकासशील देशों की आर्थिक मदद करेंगे।

4) क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.) नामक याैगिक की खोज प्रशीतन केक्षेत्र में क्रांतिकारी उपलब्धि रही ।’ स्पष्ट कीजिए।
SOLUTION
सन 1930 से पहले प्रशीतन के लिए अमोनिया और सल्फर डाइऑक्साइड गैसों का इस्तेमाल किया जाता था, जो अत्यंत तीक्ष्ण होने के कारण मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक थीं। तीस के दशक में क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सी. एफ. सी.) नामक यौगिक की खोज प्रशीतन के क्षेत्र में क्रांतिकारी उपलब्धि रही। ये रसायन रंगहीन, गंधहीन, अक्रियाशील होने के साथ ही ज्वलनशील होने के कारण आदर्श प्रशीतक माने गए। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर सी एफ सी यौगिकों का उत्पादन होने लगा और घरेलू कीटनाशक, प्रसाधन सामग्री, दवाएँ, रंग-रोगन, यहाँ तक कि रेफ्रीजिरेटर और एयरकंडिशनर में इनका खूब इस्तेमाल होने लगा।


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अतिरिक्त प्रश्न | Q 1 | Page 56

SOLUTION
(१) एकांकी : 
(अ) रीढ़ की हड्डी
(ब) महाभारत की साँझ

(२) नाटक : 
(अ) ध्रुवस्वामिनी
(ब) अंधेर नगरी

(३) आत्मकथा :
(अ) सत्य के प्रयोग
(ब) तरुण के स्वप्न

(४) खंडकाव्य :
(अ) उर्वशी
(ब) राम की शक्तिपूजा

(५) महाकाव्य :
(अ) रामचरित मानस
(ब) कामायनी

(६) उपन्यास :
(अ) गोदान
(ब) सुनीता

(७) कविता संग्रह :
(अ) यामा
(ब) कितनी नावों में कितनी बार

(८) यात्रा वर्णन :
(अ) मेरी तिब्बत यात्रा 
(ब) पैरों में पंख बाँधकर

ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय | ojon vighatan ka sankat svaadhyaay 

लेखक परिचय ः डॉ. कृष्ण कुमार मिश्र जी का जन्म १5 मार्च १९६६ को उत्तर प्रदेश के जौनपुर में हुआ । आपने हिंदी  साहित्य में विज्ञान संबंधी लेखन कार्यमें अपनी विशेष पहचान बनाई है । आपने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से १९९२ में  रसायन शास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । आपने विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और जनमानस तक पहुँचाने का महनीय  कार्यकिया है । इसके लिए आपने लोक विज्ञान के अनेक विषयों पर हिंदी में व्यापक लेखन किया है । विज्ञान से संबंधित आपकी अनेक मौलिक एवं अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आप विज्ञान लेखन की समकालीन पीढ़ी के सशक्त  हस्ताक्षर हैं । आप मुंबई के होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केंद्र में वैज्ञानिक हैं । 

प्रमुख कृतियाँ ः ‘लोक विज्ञान : समकालीन रचनाएँ’, ‘विज्ञान-मानव की यशोगाथा’, ‘जल-जीवन का आधार’ आदि ।

विधा परिचय ः प्रस्तुत पाठ विज्ञान संबंधी लेख है । वर्तमान समय में लेख का स्वरूप विस्तृत और बहुआयामी हो गया  है । इसमें विज्ञान, सूचना एवं तकनीकी विज्ञान जैसे विषयों का लेखन भी समाहित हो गया है । विज्ञान जैसे विषयों पर अनेक  लेख विभिन्न पत्रिकाओं तथा पुस्तकों के रूप में पाठकों के सम्मुख आ रहे हैं जो ज्ञानवृद्‌धि में सहायक हो रहे हैं । 

पाठ परिचय ः प्रस्तुत पाठ में मनुष्य की सुविधाओं के लिए किए जाने वाले अनुसंधानों और उत्पादित किए जाने वाले साधनों  के कारण पर्यावरण के होते जा रहे ह्रास की ओर संकेत किया गया है । वर्तमान समय में ओजोन की परत में छेद होना अथवा  परत को क्षति पहुँचना मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति का परिणाम है । हमें यह भली-भाँति समझना होगा कि यद्यपि सूर्य हमारा  जीवनदाता है परंतु उसकी पराबैंगनी किरणें संपूर्ण चराचर सृष्टि के लिए घातक सिद्ध होती हैं । अत: आज यह आवश्यक है  कि ओजोन के विघटन को रोकने का हम संकल्प करें और मानव जाति को इस संकट से उबारें ।

ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय | ojon vighatan ka sankat svaadhyaay [ 12th कृती और स्वाध्याय ] 


वर्तमान युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी का युग है ।  दुनिया में भौतिक विकास हासिल कर लेने की होड़ मची  है । विकास की इस दौड़ में जाने-अनजाने हमने अनेक  विसंगतियों को जन्म दिया है । प्रदूषण उनमें से एक अहम समस्या है । हमारे भूमंडल में हवा और पानी बुरी तरह  प्रदूषित हुए हैं । यहाँतक कि मिट्टी भी आज प्रदूषण से  अछूती नहीं रही । इस प्रदूषण की चपेट से शायद ही कोई  चीज बची हो । साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा मिलना  मुश्किल हो रहा है । जीने के लिए साफ पानी कम लोगों को  ही नसीब हो रहा है । पर्यावरणविदों का कहना है कि अगले  पच्चीस सालों में दुनिया को पेयजल के घनघोर संकट का  सामना करना पड़ सकता है । आज शायद ही कोई जलस्रोत प्रदूषण से अप्रभावित बचा हो । कुछ लोगों का कहना है कि अगला विश्वयुद्ध राजनीतिक, सामरिक या आर्थिक हितों  के चलते नहीं, वरन् पानी के लिए होगा । यह तस्वीर  नि:संदेह भयावह है लेकिन इसे किसी भी तरह से अतिरंजित नहीं कहा जाना चाहिए । परिस्थितियाँजिस तरह से बदल  रही हैं और धरती पर संसाधनों के दोहन के चलते जिस तरह  से जबर्दस्त दबाव पड़ रहा है तथा समूची परिस्थिति का तंत्र जिस तरह चरमरा गया है, उसके चलते कुछ भी संभव  हो सकता है ।

फिलहाल यहाँ हम पर्यावरणीय प्रदूषण के सिर्फ एक  पहलू की चर्चा कर रहे हैं और वह है ओजोन विघटन का  संकट । पिछले कई वर्षों से पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हो  रही है तथा इसे लेकर खासी चिंता व्यक्त की जा रही है ।  आखिर यहाँ सवाल समूची मानव सभ्यता के अस्तित्व का  है । प्रश्न उठता है कि यह ओजोन है क्या? यह कहाँस्थित है और उसकी उपयोगिता क्या है? इसका विघटन क्यों और  कैसे हो रहा है? ओजोन विघटन के खतरे क्या-क्या हैं?  और यदि ये खतरे एक हकीकत हैं तो इस दिशा में हम कितने गंभीर हैं और इससे निपटने के लिए क्या कुछ  एहतियाती कदम उठा रहे हैं? ओजोन एक गैस है जो आॅक्सीजन के तीन परमाणुओं  से मिलकर बनी होती है । यह गैस नीले रंग की होती है और  प्रकृति में तीक्ष्ण और विषैली होती है । यह मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है और श्वसन नलिका में जाने पर  जलन पैदा करती है लेकिन वायुमंडल में मौजूद यही गैस  हमारी रक्षा भी करती है । यह वह ओजोन गैस है जिसकी

वजह से धरती पर जीवन फल-फूल सका है । धरती पर  जीवन के अस्तित्व का श्रेय एक तरह से ओजोन को ही  जाता है । ओजोन गैस धरती के वायुमंडल में १5 से २०  किलोमीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है । वायुमंडल का  यह क्षेत्र स्ट्रेटोस्फियर कहलाता है । ओजोन की सबसे  ज्यादा सांद्रता धरती से २5 किलोमीटर की ऊँचाई पर होती  है । जैसा कि हम जानते हैं कि सौर विकिरण में तमाम तरह  की किरणें होती हैं । इनमें दृश्य प्रकाश, अवरक्त किरणें  और पराबैंगनी किरणें होती हैं । पराबैंगनी किरणें अल्प तरंगदैर्ध्य की किरणें होती हैं । 

ये किरणें काफी घातक होती  हैं क्योंकि इनमें ऊर्जा बहुत ज्यादा होती है । हमारे वायुमंडल में मौजूद ओजोन बाह्य अंतरिक्ष से  आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है  और उन्हें धरती तक नहीं आने देती । यदि ये किरणें  बेरोक-टोक धरती की सतह तक चली आएँतो इनसान के  साथ ही जीवमंडल के तमाम दूसरे जीव-जंतुओं को भारी  नुकसान हो सकता है । इन पराबैंगनी किरणों से मनुष्यों में  त्वचा के कैंसर से लेकर दूसरे अनेक तरह के रोग हो सकते  हैं । जिस तरह रोजमर्रा के जीवन में सामान्य छतरी धूप और  बरसात से हमारा बचाव करती है; उसी तरह वायुमंडल में  स्थित ओजोन की परत हमें घातक किरणों से बचाती है ।  

इसीलिए प्राय: इसे ‘ओजोन छतरी’ के नाम से भी पुकारते  हैं । सभ्यता के आदिम काल से यह छतरी जीव-जंतुओं  और पेड़-पौधों की रक्षा करती रही है और उसके तले  सभ्यता फलती-फूलती रही है । विकास की अंधी दौड़ में  हमने संसाधनों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया है । इस दौरान  हमें इस बात का ध्यान प्राय: कम ही रहा है कि इसका  दुष्प्रभाव क्या हो सकता है ! आज परिणाम हम सबके  सामने हैं । हमारे कारनामों से प्राकृतिक संतुलन चरमरा गया  है । भूमंडल पर शायद ही ऐसी कोई चीज शेष हो जो हमारे  क्रियाकलापों से प्रभावित न हुई हो । स्पष्ट है; ओजोन भी  इसका अपवाद नहीं है । आइए, अब देखें कि ओजोन का विघटन क्यों और  कैसे हो रहा है? जैसा कि हम जानते हैं कि दैनिक जीवन में  कीटनाशक, प्रसाधन सामग्री, दवाएँ, रंग-रोगन से लेकर  प्रशीतक (फ्रीज) और एयरकंडिशनिंग वगैरह में प्रशीतन का  अहम स्थान है । सन १९३० से पहले प्रशीतन के लिए  अमोनिया और सल्फर डाइ ऑक्साइड गैसों का इस्तेमाल  होता था लेकिन उनके इस्तेमाल में अनेक व्यावहारिक  कठिनाइयाँथीं ।

 उदाहरणार्थ - ये गैसें तीक्ष्ण थीं और मानव  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक थीं । अत: वैज्ञानिकों को एक  अरसे से इनके उचित विकल्प की तलाश थी जो इन कमियों  से मुक्त हो । इस क्रम में तीस के दशक में थाॅमस मिडले  द्वारा क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.) नामक यौगिक  की खोज प्रशीतन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपलब्धि रही । अध्ययन से पाया गया कि ये रसायन सर्वोत्तम प्रशीतक हो सकते हैं क्योंकि ये रंगहीन, गंधहीन,  अक्रियाशील होने के साथ-साथ अज्वलनशील भी थे ।  इस तरह ये आदर्श प्रशीतक सिद्ध हुए । इसके बाद तो  प्रशीतन में सी.एफ.सी. का इस्तेमाल चल निकला ।  प्रशीतन उद्योग में अमोनिया और सल्फर डाइ ऑक्साइड  की जगह सी.एफ.सी. ने ले ली । इससे प्रशीतन प्रौद्योगिकी  में एक क्रांति-सी आ गई । तदनंतर बड़े पैमाने पर  सी.एफ.सी. यौगिकों का उत्पादन होने लगा और घरेलू  कीटनाशक, प्रसाधन सामग्री, दवाएँ, रंग-रोगन से लेकर  फ्रीज और एयरकंडिशनर में इनका खूब इस्तेमाल होने  लगा । सी.एफ.सी. यौगिकों का एक खास गुण है कि ये नष्ट नहीं होते । 

इनका न तो आॅक्सीकरण होता है और न ही  अपघटन । ये पानी में भी नहीं घुलते । यहाँ स्वाभाविक रूप  से सवाल उठता है कि इस्तेमाल में आने वाले इन यौगिकों  का आखिर होता क्या है? सबसे पहले एक अमेरिकी  वैज्ञानिक एफ.एस.रोलैंड का ध्यान इस प्रश्न की ओर गया । उन्होंने इस दिशा में लगातार कई वर्षों तक अनुसंधान  किया । उनका शोधपत्र जब १९७4 में ‘नेचर’ नामक  प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुआ तो पूरी दुनिया में एक  हलचल-सी मच गई । अपने पत्र में रोलैंड ने निष्कर्षदिया  था कि ये यौगिक धरती की ओजोन परत को नष्ट कर चुके  हैं । शुरू में लोगों ने रोलैंड की बातों को कोई खास अहमियत नहीं दी । कुछ लोगों ने उन्हें ‘आतंकित पर्यावरणवादी’  कहकर उनका उपहास किया लेकिन कुछ ही साल बाद  १९85 ई. में ब्रिटिश सर्वे टीम के कार्यों से रोलैंड की बात सही साबित हो गई । टीम ने न केवल ओजोन विघटन की  पुष्टि की बल्कि अध्ययन करके बताया कि दक्षिणी ध्रुव  क्षेत्र में ओजोन की परत काफी छीज चुकी है और उसकी  वजह से वहाँ एक बड़ा छिद्र हो गया है । 

अमेरिकी उपग्रह  निंबस द्वारा भेजे गए चित्र से भी रोलैंड की बात की पुष्टि  हुई । ब्रिटिश टीम ने चेताया भी कि यदि बहुत जल्दी ओजोन  विघटन को न रोका गया तो ओजोन परत के छीजने से आने  वाली पराबैंगनी किरणों से धरती के तापमान में वृद्‌धि होगी  तथा अनेकानेक तरह की त्वचा संबंधी व्याधियाँ फैलेंगी । त्वचा के कैंसर के रोगियों की संख्या लाखों में  होगी । सी.एफ.सी. रसायन चूँकि हवा से हल्के होते हैं;  अत: इस्तेमाल में आने के बाद मुक्त होकर ये सीधे  वातावरण में ऊँचाई पर चले जाते हैं । वायुमंडल में ऊपर  पहुँचने पर ये यौगिक पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आते हैं  जहाँ इनका प्रकाश अपघटन (फोटोलिसिस) होता है ।  फोटोलिसिस से क्लोरीनमुक्त मूलक पैदा होते हैं । क्लोरीन  के ये मुक्त मूलक ओजोन से अभिक्रिया करके उसे  आॅक्सीजन में बदल देते हैं । इस तरह ओजोन का ह्रास होने  से ओजोन की परत धीरे-धीरे छीजती जा रही है । वस्तुत:  आज ओजोन छतरी का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है ।  जिस सी.एफ.सी. को हम निष्क्रिय समझते थे; वह इतनी  सक्रिय है कि उससे निकला एक क्लोरीनमुक्त मूलक  ओजोन गैस के एक लाख अणुओं को तोड़कर आॅक्सीजन  में बदल देता है । ऐसा श्रृंखला अभिक्रिया के कारण होता  है । 

यहाँ गौरतलब है कि सन १९७4 में पूरी दुनिया में  सी.एफ.सी. की खपत ९ लाख टन थी । पिछले कई वर्षों  के शोध से मालूम हुआ है कि दक्षिणी ध्रुव के ऊपर मौजूद  छिद्र आकार में बढ़ता जा रहा है । हाल के वर्षों में उत्तरी  ध्रुव के ऊपर भी ओजोन के विघटन और ओजोन आवरण में छिद्र पाए जाने की सूचना मिली है जो बेहद चिंतनीय है । ओजोन संकट पर विचार करने के लिए दुनिया के  अनेक देशों की पहली बैठक १९85 में विएना में हुई । बाद  में सितंबर १९8७ में कनाडा के शहर मांट्रियल में बैठक हुई  जिसमें दुनिया के 48 देशों ने भाग लिया था । इस बैठक में  जिस मसौदे को अंतिम रूप दिया उसे मांट्रियल प्रोटोकॉल  कहते हैं । इसके तहत यह प्रावधान रखा गया कि सन  १९९5 तक सभी देश सी.एफ.सी. की खपत में 5० प्रतिशत की कटौती तथा १९९७ तक 85 प्रतिशत की कटौती  करेंगे । मसौदे के कई बिंदुओं पर विकसित और विकासशील  देशों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए । 

मुद्दा था गैर  सी.एफ.सी. प्रौद्योगिकी तथा उसका हस्तांतरण ।  विकासशील देश चाहते थे कि इसपर आने वाला खर्च धनी  देश वहन करें क्योंकि ओजोन विघटन के लिए वे ही  जिम्मेदार हैं । सन १९९० के ताजा आँकड़ों के अनुसार पूरी  दुनिया में सी.एफ.सी. की खपत १२ लाख टन तक पहुँच  गई थी जिसकी ३० प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले अमेरिका  की थी । भारत का प्रतिशत मात्र ०.६ था । भारत की तुलना  में अमेरिका की सी.एफ.सी. की खपत 5० गुना ज्यादा  थी । समस्या पर विचार करने के लिए लंदन में एक बैठक  हुई जहाँ नए प्रशीतनों की खोज और पुरानी तकनीक में  विस्थापन के लिए एक कोष बनाने की माँग की गई । यहाँ विकासशील देशों के दबाव के चलते विकसित देशों को  कई रियायतें देनी पड़ीं । इसके अंतर्गत नई तकनीकों के  हस्तांतरण में मदद के साथ-साथ सी.एफ.सी. के विकल्प की खोज में दूसरे देशों को धन मुहैया कराना मुख्य है । 

 समझौते के तहत यह व्यवस्था है कि सन २०१० तक  विकासशील देश सी.एफ.सी. का इस्तेमाल एकदम बंद कर  देंगे । इस दौरान विकसित देश नए प्रशीतकों की खोज में  विकासशील देशों की आर्थिक मदद करेंगे । स्थिति की गंभीरता को देखते हुए दुनिया के सभी देशों  ने इस बारे में विचार करके समुचित कदम उठाने शुरू कर  दिए हैं । ‘ग्रीनहाउस’ के प्रभाव के कारण आज धरती का  तापमान निरंतर बढ़ रहा है । इसमें ओजोन विघटन की भी  अहम भूमिका है । पराबैंगनी किरणें जब धरती तक आती हैं  तो स्थलमंडल में मौजूद वस्तुओं द्वारा अवशोषित कर ली  जाती हैं । ये वस्तुएँ पराबैंगनी के अवशोषण के बाद अवरक्त


विकिरण उत्सर्जित करती हैं । ये किरणें वापस वायुमंडल के  बाहर नहीं जा पातीं क्योंकि हवा में मौजूद कई गैसें उन्हें  अवशोषित कर लेती हैं । इस तरह से धरती का तापमान  बढ़ता है । तापमान बढ़ने से ध्रुवों पर जमी हुई विशाल बर्फ राशि के पिघलने के समाचार भी आ रहे हैं । यदि ऐसा होता  रहा तो समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और तमाम तटीय क्षेत्र पानी में डूब सकते हैं । तापवृद्‌धि से जलवायु में जबर्दस्त  बदलाव आ सकता है । मानसून में परिवर्तन के साथ कहीं  अतिवृष्टि तो कहीं अकाल जैसी स्थिति आ सकती है । वैसे  विगत एक सदी के दौरान भूमंडल में काफी परिवर्तन पाया  गया है । हाल ही में शोध के बाद पाया गया कि हिमालय में  गंगोत्री स्थित गोमुख हिमनद हर साल १8 मीटर पीछे की  ओर खिसकता जा रहा है ।

 अगर यही हाल रहा तो संभव है  कि इक्कीसवीं सदी के प्रथमार्धतक यही हिमनद तथा साथ ही हिमालय के दूसरे हिमनद भी गलकर समाप्त हो जाएँ ।  ऐसे में उत्तर भारत में बहने वाली नदियों का अस्तित्व मिट  जाएगा और मैदानों की उपजाऊ भूमि ऊसर में बदल जाने से  कोई रोक नहीं सकेगा । अगर समय रहते स्थिति पर काबू  नहीं पाया गया तो इसके गंभीर परिणामों से इनकार नहीं  किया जा सकता । ओजोन विघटन के व्यापक दुष्प्रभावों के  चलते इनसानी सभ्यता संकटापन्न है । अत: जरूरत है कि फौरन इससे निपटने के लिए समग्र कदम उठाए जाएँ अन्यथा  कल तक तो शायद बहुत देर हो जाएगी ।

(‘लोक विज्ञान : समकालीन रचनाएँ’ संग्रह से)
  • ओजोन विघटन का संकट पाठ के लेखक
  • ओजोन विघटन का संकट पाठ के लेखक हैं
  • ओजोन विघटन का संकट किसकी रचना हैं
  • ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय
  • ओजोन विघटन का संकट पाठ के लेखक का नाम

ओजोन विघटन का संकट स्वाध्याय | ojon vighatan ka sankat svaadhyaay 

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