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शोधपरख लेख : प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव स्वाध्याय | Prakash Utpann Karne Wale Jeev

प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव स्वाध्याय | Prakash Utpann Karne Wale Jeev 

शोधपरख लेख : प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव स्वाध्याय | Prakash Utpann Karne Wale Jeev

पाठ पर आधारित 

पाठ पर आधारित | Q 1 | Page 104
1) प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों द्‌वारा प्रकाश उत्पन्न करने के उद्देश्यों की जानकारी दीजिए ।
SOLUTION
हम कोई भी काम करते हैं, तो उसके पीछे हमारा कोईन-कोई उद्देश्य होता है। उसी तरह प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों का भी प्रकाश उत्पन्न करने के पीछे सार्थक उद्देश्य होता है।
वातावरण में लाखों कीट-पतंगे उड़ते रहते हैं। प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों का अँधेरे में प्रकाश उत्पन्न करने का एक कारण उजाले में अपने साथी की खोज करना होता है। इसके अलावा प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव इससे संकेतों का आदान-प्रदान भी करते हैं।
जीवों द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने का दूसरा उद्देश्य उजाले में अपने शिकार को खोजना होता है। वह उजाले में शिकार को स्पष्ट रूप से देखकर उसे अपना शिकार बना सकता है। कुछ जीव अपने प्रकाश से शिकार को आकर्षित करने का काम भी करते हैं। प्रकाश से आकर्षित होकर शिकार जब उसके पास आता है, तो वह आसानी से उसे अपना शिकार बना लेता है।

कुछ जीव, विशेषकर मछलियां, कामाफ्लास के लिए प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इस प्रकाश में वे अपने परिवेश से इतना घुल-मिल जाते हैं कि सरलता से वे दिखाई नहीं देते। इससे उन जीवों को शिकार करने और अपने आप को सुरक्षित रखने में सुविधा होती है।

जीवों द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने का उद्देश्य आत्मरक्षा करना भी होता है। सागरों और महासागरों में पाए जाने वाले कुछ जीव अपने प्रकाश उत्पादक अंगों से प्रकाश उत्पन्न करते हैं। ये स्क्विड के समान अपने शरीर से एक विशेष प्रकार का तरल रसायन छोड़ते हैं, जो पानी में मिलकर चमकीला प्रकाश-सा हो जाता हैं। इससे उनका शत्रु उन्हें देख नहीं पाता है और वे वहाँ से भागने में सफल हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने के कई सार्थक उद्देश्य होते हैं।

2) प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों की वैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से जानकारी लिखिए ।
SOLUTION
प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों के बारे में किए गए विभिन्न अध्ययनों से वैज्ञानिकों को अनेक प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं। प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव जमीन और जल दोनों स्थानों पर पाए जाते हैं। जल में पाए जाने वाले ये जीव तालाबों और नदियों के जल में नहीं पाए जाते। प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव खारे जल वाले गहरे समुद्रों में पाए जाते हैं। इनमें जेलीफिश, स्क्विड, क्रिल तथा विभिन्न जातियों वाले झींगे मुख्य हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव दो प्रकार से प्रकाश उत्पन्न करते हैं - एक तो अपने शरीर पर पाए जाने वाले जीवाणुओं के माध्यम से, दूसरे रसायन के पदार्थों को पारस्परिक क्रिया के द्वारा। जीवाणुओं द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों के पूरे शरीर पर प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवाणु रहते हैं। ये निरंतर प्रकाश उत्पन्न करते रहते हैं। इन जीवों में इस प्रकाश को ढकने अथवा प्रकाश वाले भाग को अपने शरीर के अंदर खींचने की क्षमता होती है। अतः वे अपनी आवश्यकता के अनुसार इस प्रकाश का उपयोग करते हैं। रसायनों के द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों के शरीर में ल्यूसीफेरिन (Luciferin) और ल्युसिफेरेस (Luciferase) नामक रसायन होते हैं। इन दोनों रसायनों की सहायता से ये जीव प्रकाश उत्पन्न करते हैं।

अधिकांश जीव जीवाणुओं द्वारा अथवा रासायनिक क्रिया द्वारा प्रकाश उत्पन्न करते हैं। पर कुछ ऐसे भी जीव होते हैं, जिनके शरीर पर न तो प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवाणु रहते हैं और न ही उनके शरीर पर रसायन उत्पन्न करने वाले अंग ही होते हैं। फिर भी ये प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इन जीवों के शरीर में विशेष प्रकार के द्रव पदार्थ वाली ग्रंथि होती है। यह द्रव पदार्थ पानी के संपर्क में आते ही प्रकाश उत्पन्न करता है। समुद्र में पाए जाने वाले प्रकाश उत्पादक जीवों के लिए पानी आवश्यक होता है। ये जीव पानी के बाहर प्रकाश उत्पन्न नहीं कर सकते। प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों की संख्या काफी है। जीव वैज्ञानिक अभी प्रकाश उत्पन्न करने वाले नए-नए जीवों की खोज कर रहे हैं तथा उनके द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले प्रकाश पर शोध कर रहे हैं।

3) समुद्री जीवों पर शोधपूर्ण आलेख पढ़ें।
SOLUTION
पृथ्वी के तीन चौथाई हिस्से पर समुद्र की विशाल जल राशि व्याप्त है। इस जल राशि में समुद्री जीवों की विचित्र दुनिया है। ऐसी दुनिया जिसके बारे में जानकर दाँतों तले ऊँगली दबा लेनी पड़ती है।
समुद्र बड़े-छोटे, रंगबिरंगे, खतरनाक विषैले जीवों तथा प्रकाश उत्पन्न करने वाले असंख्य जीवों से भरा पड़ा है।
एक ओर जहाँ समुद्र में पाए जाने वाले जीवों पर आधारित मत्स्य उद्योग, सजावटी सामानों तथा अन्य अनेक वस्तुओं के व्यवसाय फल-फूल रहे हैं, वहीं समुद्र में अभी भी ऐसे अनेक जीव हैं जिनके बारे में हम जानते तक नहीं।

समुद्र के अद्भुत संसार में पाया जाने वाला अद्भुत जीव है व्हेल। यह समुद्र का सबसे बड़ा जीव है। इसकी लंबाई २५ मीटर और वजन १५० से १८० टन तक होता है। गहरे पानी में पाया जाने वाला यह जीव साँस लेने के लिए जब अपने सिर में बने छेद से पानी फेंकता है तो लगता है, जैसे बादल फटकर बरसात हो रही हो। विशाल जीवों में खतरनाक शार्क मछली भी मशहूर है। यह इतनी खतरनाक होती है कि अन्य समुद्री जीव इससे दूरी बनाकर चलते हैं। समुद्र में बिजली की तरह करंट मारने वाली दो मीटर लंबी बामी मछली की शकल-सूरत वाली एक मछली पाई जाती है, जिसका नाम है ईल।

 इसके शरीर में ८६० वॉट का करंट प्रवाहित होता है। यह अपने इस करंट से मगर जैसे खतरनाक जीव को भी मार डालती है। समुद्र में पाई जाने वाली सॉर्ड फिश चपटे और बहुत बड़े आकार की होती है। उसका थूथना नुकीला होता है और वजन ६०० किलो तक का होता है। स्टिंग रे फिश का आकार हवाई जहाज जैसा होता है और इसके जबड़े के पास वाले दो बड़े-बड़े कांटे बहुत विषैले होते हैं। विषैली मछलियों में जेली फिश का भी समावेश हैं। यह पारदर्शी होती है और इसके शरीर से लटकने वाले रेशे बहुत विषैले होते हैं। इसलिए इसे पकड़कर उठाते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ती हैं।

समुद्र में कुछ ऐसी मछलियां भी पाई जाती हैं, जो उड़ सकती हैं। इन्हें फ्लाइंग फिश के नाम से जाना जाता है। ये पानी की सतह के ऊपर तेज गति से उड़ती हुई जाती हैं। ये मछलियाँ आकार में छोटी होती हैं। समुद्र में तीक्ष्ण दाँतों वाली पॉफर नाम की एक विचित्र मछली पाई जाती है। वह सामान्य मछलियों की तरह लंबी होती है पर छूने पर यह गोल आकार धारण कर लेती है। समुद्र सी-हार्स, शील, डॉल्फिन, लायन फिश, शंख, सीपियों, धोंधों, केकड़ों, कछुओं तथा विभिन्न प्रकार के साँपों से भरा हुआ है। इसमें तरह-तरह की हजारों किस्म की रंग बिरंगी मछलियां पाई जाती हैं।

इसके अलावा समुद्र में प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों का विशाल संसार है। ये जीव अपने शिकार करने अथवा अपनी आत्मरक्षा के लिए प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इन जीवों में ऑक्टोपस, एंगलर मछलियां, कटलफिश, कार्डिनल मछली, क्रिल, जेली फिश, टोड मछली, धनुर्धारी मछली, वाम्बेडक मछली, मूँगे, लालटेल मछली, वाइपर मछली, शंबुक, समुद्री कासनी, समुद्री स्लग, समुद्री स्क्विड, स्क्विड तथा व्हेल मछली प्रमुख हैं। जीव वैज्ञानिक अभी भी समुद्र में प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों की खोज का कार्य कर रहे हैं। जिस प्रकार समुद्र का आरपार नहीं है उसी प्रकार समुद्री जीवों का भी आरपार नहीं है।

4) प्रकाश उत्पन्न करने वाले किसी एक जीव की खोज कीजिए ।
SOLUTION
संसार में प्रकाश उत्पन्न करने वाले अनेक जीव हैं। प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। एक जमीन पर पाए जाने वाले जीव और दूसरे जल में पाए जाने वाले जीव। यहाँ हम जमीन पर पाए जाने वाले प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव जुगनू की जानकारी प्राप्त करेंगे।

जुगनू एक सामान्य कीड़ा है, जो रात के अंधेरे में आकाश में रुक-रुक कर प्रकाश करते हुए उड़ता है। यह ग्रामीण भागों में सर्वत्र पाया जाता है। गाँवों में अकसर बच्चे जुगनू को मुट्ठी में पकड़ कर खेलते हैं। दूसरे बच्चे यह देख कर ताज्जुब करते हैं कि आग को मुट्ठी में पकड़ने पर भी उसका हाथ जला क्यों नहीं। पर प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों के प्रकाश में ऊष्मा नहीं होती। यह प्रकाश ठंडा होता है। इसलिए हाथ जलने का सवालही नहीं उठता। प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव दो प्रकार से प्रकाश उत्पन्न करते हैं। एक जीवाणुओं द्वारा और दूसरे रासायनिक, पदार्थों की पारस्परिक क्रिया द्वारा। जुगनू रासायनिक पदार्थों की पारस्परिक क्रिया द्वारा प्रकाश उत्पन्न करता है।

वह रात के अंधेरे में आकाश में उड़ते हुए रुक-रुक प्रकाश छोड़ता है। यह प्रकाश उसके शरीर के पिछले हिस्से में चमकता हुआ दिखाई देता है। जुगनू अपने छोटे-छोटे पैरों से उड़ता है। रात के अँधेरे में उड़ते हुए जुगनू के प्रकाश उत्पन्न करने के कई कारण है। दिन में जुगनू चिड़ियों आदि के खाए जाने के डर से झाड़ियों में छुपा रहता है। रात के समय उत्युक्त आकाश में उसे उड़ने का अवसर मिलता है। उड़ते समय वह अपने साथी की प्रकाश के द्वारा खोज करता है। इस तरह के प्रकाश में उसका एक मकसद अपने शिकार करने की खोज करना भी होता है। लेकिन उसके शरीर से प्रकाश उत्पन्न करने से वह अपने बड़े शत्रु कीट-पतंगे की नजर में आ जाता है और आसानी से वह उनका शिकार भी बन जाता है। जुगनू के प्रकाश उत्पन्न करने के पीछे वैज्ञानिक कारण जो भी हों, उसे प्रकाश उत्पन्न करते हुए उड़ते देखना सब को अच्छा लगता है।

प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव स्वाध्याय | Prakash Utpann Karne Wale Jeev 

लेखक परिचय ः डॉ. परशुराम शुक्ल जी का जन्म ६ जून १९4७ काे उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ । आप बाल साहित्य लेखन में जितने सिद्धहस्त हैं; उतने ही पशु जगत का विश्लेषण करने में भी सिद्धहस्त माने जाते हैं । आपके बाल साहित्य में बालकों के मनोविज्ञान और कार्यव्यापार का बड़ी सूक्ष्मता से अंकन हुआ है तो भारतीय वन्य जीवों का अनुसंधानपरक  अध्ययन और लेखन आपके लेखों और पुस्तकों द्वारा प्रकट होता है । आपकी अनेक कृतियों का अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है । विषय के अनुसार भाषा का प्रयाेग आपकी भाषाकी विशेषता है । आपको राष्ट्रीय स्तर के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है । 

प्रमुख कृतियाँ ः ‘जासूस परमचंद के कारनामे’ (बाल धारावाहिक), ‘नन्हा जासूस’ (बाल कहानी संग्रह), ‘सुनहरी परी और  राजकुमार’ (बाल उपन्यास), ‘नंदनवन’, ‘आओ बच्चो, गाओ बच्चो’, ‘मंगल ग्रह जाएँगे’ (बाल कविता संग्रह) आदि ।

लेख ः लेख लिखने की परंपरा हमारे यहाँ बहुत पहले से चली आ रही है । लेख में वस्तुनिष्ठता, ज्ञानपरकता, शोधपरकता  जैसे तत्त्वों का समावेश रहता है । लेख समाज विज्ञान, राजनीति, इतिहास जैसे विषयों पर ज्ञानवर्द्धन करने के  साथ-साथ जानकारी का नवीनीकरण भी करते हैं । लेख में उदाहरणों का समावेश लेख को रोचकता प्रदान करता है ।

पाठ परिचय ः प्रस्तुत पाठ में प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव जैसे विषय पर प्रकाश डाला गया है । जुगनू को छोड़कर ऐसे  असंख्य जीव हैं जो प्रकाश उत्पन्न करते हैंे; इस तथ्य से शायद हम परिचित न हों परंतु लेखक कीशोधपरक दृष्टि इस सत्यको विश्लेषित करती है और हम इस वैज्ञानिक सत्य से अवगत होकर विस्मित हो जाते हैं। लेखक कहना चाहते हैं कि हमें विज्ञान की आँखों से अपने आस-पास की दुनिया को देखने की आवश्यकता है ।संसार में व्याप्त असंख्य अज्ञात तथ्यों की जानकारी हमें प्राप्त होती है 

प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव स्वाध्याय | Prakash Utpann Karne Wale Jeev 


मानव सहित विश्व के अधिकांश जीवों के जीवन में  प्रकाश का बहुत महत्त्व है । विश्व में ऐसे बहुत-से जीव पाए जाते हैं, जिनके आँखें नहीं होतीं । इनके लिए प्रकाश  का कोई महत्त्व नहीं हाेता । मोती बनाने वाला समुद्री घोंघा  मुक्ताशुक्ति (Pearl Oyster) का सर्वोत्तम उदाहरण है ।इसी प्रकार विश्व में ऐसे बहुत-से जीव पाए जाते हैं, जो अपना रास्ता मालूम करने के लिए तथा इसी प्रकार के अन्य कार्य करने के लिए अपनी दृष्टि का उपयोग करते हैं । प्रकाश के अभाव में अपने कार्य करना बहुत कठिन हो जाता है । इस समस्या को दूर करने के लिए मानव टार्च, ल्ब एवं इसी प्रकार की अन्य कृत्रिम वस्तुओं का आविष्कार करता है ।

 पशु-पक्षी इस प्रकार के कृत्रिमआविष्कार नहीं कर सकते । अत: प्रकृति ने उन्हें विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ प्रदान की हैं । उदाहरण के लिए उल्लूकी आँखें बड़ी होतीहैं, जिससे वह रात के अँधेरे में सरलता से देख सकता है । रात में शिकार करने वाले जीवों-बाघ, सिंह, तेंदुआआदि की आँखों की संरचना इस प्रकार की होती है कि वे रात के अँधेरे में अपने शिकार की खोज कर सकते हैं । अर्थात पूर्ण अंधकार की स्थिति में विश्व का कोई भी जीव कुछ भी नहीं देख सकता । विश्व में ऐसे भी अनेक जीव पाए जाते हैं, जिन्होंने अपने शरीर पर प्रकाश उत्पन्न करने वाले अंग विकसित कर लिए हैं तथा अपनी आवश्यकतानुसार इन अंगों से प्रकाश उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार के जीवों को प्रकाश उत्पन्न  करने वाले (Bioluminiscent) जीव कहते हैं । 

प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव अपने प्रकाश का  उपयोग ठीक उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार मानव टाॅर्च,  बल्ब आदि का उपयोग करता है, किंतु मानव और प्रकाश  उत्पन्न करने वाले जीवों के प्रकाश में बहुत अंतर होता है ।  मानव द्वारा तैयार किए गए प्रकाश उत्पन्न करने वाले बल्ब जैसे उपकरणों में तंतु (Filament) को इतना गर्म करते हैं कि ह प्रकाश उत्पन्न करने लगता है । इस प्रकार के उपकरणों  में प्रकाश के साथ ही ऊष्मा (Heat) भी उत्पन्न होती है ।  अत: इसे गर्म प्रकाश (Hot Light) कहा जा सकता है । प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव जीवाणुओं द्वारा  अथवा अपने शरीर से उत्पन्न रसायनों की पारस्परिक क्रिया  द्वारा प्रकाश उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार प्रकाश उत्पन्न  करने में ऊष्मा उत्पन्न नहीं होती । प्रकाश उत्पन्न करने वाले  जीवों के प्रकाश उत्पन्न करने की प्रक्रिया को ल्यूमिनिसेंस (Luminiscence) कहते हैं । इस प्रक्रिया द्वारा प्रकाश  उत्पन्न करने में प्रकाश तो उत्पन्न होता है किंतु इसमें ऊष्मा नहीं होती । अत: इसे शीतल प्रकाश अथवा ठंडा प्रकाश  कहा जाता है । प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव विश्व में सभी स्थानों  पर पाए जाते हैं । इस प्रकार के जीवों में जनसामान्य जुगनू  Firefly) से परिचित हैं । जुगनू कीट वर्ग का जीव है और  पूरे वर्ष प्रकाश उत्पन्न करता है ।

 विश्व में कवक (Fungus) की कुछ ऐसी जातियाँ पाई जाती हैं, जो रात में प्रकाश उत्पन्न करती हैं । इन्हें  कवक की चमकने वाली जातियाँ(Glowing Species of  Fungus) कहते हैं । कवक की प्रकाश उत्पन्न करने वाली  जातियों द्वारा उत्पन्न किए गए प्रकाश को फॉक्स फायर  (Fox Fire) कहते हैं । इसी प्रकार मशरूम की कुछ जातियाँ रात में प्रकाश उत्पन्न करती हैं ।प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव थल की अपेक्षा सागरों और महासागरों में अधिक हैं । ये मुख्य रूप से २२०  मीटर से लेकर ११०० मीटर की गहराईवाले भागों में अधिक  पाए जाते हैं । इस भाग में जेलीफिश, स्क्विड, क्रिल,  विभिन्न जातियों के झींगे आदि रहते हैं तथा प्रकाश उत्पन्न  करते हैं । प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव प्राय: नदियों, झीलों,  तालाबों आदि ताजा पानी के स्रोतों में नहीं पाए जाते हैं । ये  समुद्र के खारे पानी में अधिक मिलते हैं क्योंकि समुद्र में  अधिक गहराई पर हल्का अथवा घना अँधेरा रहता है । यह  अँधेरा गहराई के साथ बढ़ता जाता है । इसके विपरीत नदियों, तालाबों, झीलों आदि में पानी के तल तक सूर्य की  किरणें पहुँच जाती हैं । अत: वहाँ प्रकाश रहता है । प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव दो प्रकार से प्रकाश  उत्पन्न करते हैं- 

(१) जीवाणुओं द्वारा और 
(२) रासायनिक पदार्थों की पारस्परिक क्रिया द्वारा । जीवाणुओं द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों  के शरीर पर ऐसे जीवाणु रहते हैं, जो प्रकाश उत्पन्न करते  हैं । इन्हीं जीवाणुओं की सहायता से ये प्रकाश उत्पन्न करने  वाले जीव बने हैं । वास्तव में ये जीव प्रकाश उत्पन्न नहीं  करते हैं बल्कि इनके शरीर पर रहने वाले जीवाणु प्रकाश

उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार के जीव प्रकाश उत्पन्न करने  वाले जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध (Symbitic  Relationship) स्थापित कर लेते हैं तथा जीवाणुओं के  प्रकाश का अपनी इच्छा एवं आवश्यकता के अनुसार उपयोग करते हैं । जीवाणुओं के प्रकाश का उपयोग करने वाले जीवों  के पूरे शरीर पर प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवाणु रहते हैं  तथा निरंतर प्रकाश उत्पन्न करते हैं । जीव इस प्रकाश का  दो प्रकार से उपयोग करते हैं- (१) शरीर का भाग भीतर  खींचकर और         

(२) प्रकाश उत्पन्न करने वाले भाग को  ढककर । जीवाणुओं के प्रकाश का उपयोग  करने वाले कुछ  जीवों में यह क्षमता होती है कि ये अपने शरीर का कोई भी  भाग शरीर के भीतर खींच सकते हैं । इस प्रकार के जीवों को  अपने शरीर के जिस भाग से प्रकाश समाप्त करना होता है;  उसे वे अपने शरीर के भीतर खींच लेते हैं । इससे प्रकाश  उत्पन्न करने वाले जीवाणु उस जीव के शरीर के भीतर पहुँच  जाते हैं । अत: उस स्थान का प्रकाश समाप्त हो जाता है ।  इस भाग को पुन: प्रकाशित करने के लिए जीव अपने शरीर  के भीतर से जीवाणुवाले भाग को बाहर निकाल देते हैं ।  इससे बंद भाग पुन: प्रकाशित हो जाता है ।

  जिन जीवों में यह क्षमता नहीं होती; वे अपने शरीर  पर रहने वाले जीवाणुओं के प्रकाश को दूसरे ढंग से नियंत्रित करते हैं । ये जीव अपने शरीर के उस भाग को ढक देते हैं जहाँ प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती । शरीर के उस भाग  को ढकने से वहाँ के जीवाणु भी ढक जाते हैं । अत: वहाँ का प्रकाश समाप्त हो जाता है । इस प्रकार के जीव अपने  शरीर का कोई एक भाग अथवा एक से अधिक भाग अपनी  इच्छा के अनुसार जब चाहे ढक सकते हैं और जब चाहे  खोल सकते हैं । प्रकाश उत्पन्न करने वाले कुछ जीव रसायनों की  सहायता से प्रकाश उत्पन्न करते हैं । इसके लिए ल्यूसीफेरिन  (Luciferin) और ल्यूसीफेरैस (Lucifrease) नामक  रसायनों की आवश्यकता होती है । ये दोनों रसायन प्रकाश  उत्पन्न करने वाले जीवों के शरीर में रहते हैं तथा इन्हीं दोनों रसायनों की सहायता से प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव  प्रकाश उत्पन्न करते हैं । इनमें ल्यूसीफेरिन प्रकाश उत्पन्न  करने का कार्य करता है । दूसरा रसायन ल्यूसीफैरेस प्रकाश  उत्पन्न करने की क्रिया को तेज कर देता है । क्रिया में  ऑक्सीजन की भी आवश्यकता होती है । सागर में पाए जाने वाले प्रकाश उत्पादक जीवों के  लिए पानी आवश्यक होता है ।

 ये जीव पानी के बाहर  प्रकाश नहीं उत्पन्न कर सकते हैं । अधिकांश जीव जीवाणुओं द्वारा अथवा रासायनिक  क्रिया द्वारा प्रकाश उत्पन्न करते हैं । कुछ ऐसे भी जीव हैं,  जिनके शरीर पर न तो प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवाणु  रहते हैं और न ही इनके शरीर पर रसायन उत्पन्न करने वाले  अंग होते हैं; फिर भी ये प्रकाश उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार  के जीवों के शरीर में एक विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है, जिससे एक विशेष प्रकार का द्रव पदार्थनिकलता है । यह  द्रव पदार्थ पानी के संपर्क में आते ही प्रकाश उत्पन्न करने  लगता है । जीववैज्ञानिकों द्वारा लंबे समय तक किए गए     अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जमीन और पानी के सभी जीव   अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रकाश उत्पन्न  करते हैं । यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि एक जीव  द्वारा उत्पन्न किया गया प्रकाश दूसरे जीव द्वारा उत्पन्न  किए गए प्रकाश से पूरी तरह भिन्न होता है अर्थात् सभी  जीव अलग-अलग तरह का प्रकाश उत्पन्न करते हैं । प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों द्वारा प्रकाश  उत्पन्न करने के निम्न उद्देश्य होते हैं :-

  साथी की खोज और संकेतों का आदान-प्रदान ।
• शिकार की खोज और शिकार को आकर्षित करना ।
• कामाफ्लास उत्पन्न करना ।
• आत्मरक्षा ।
गहरे सागरों के अनेक जीव शिकार की खोज के  लिए अपने शरीर से प्रकाश उत्पन्न करते हैं । एंगलर ऐसी ही  मछली है । सागरों और महासागरों के बहुत-से जीव विशेष  रूप से मछलियाँ कामाफ्लास के लिए प्रकाश उत्पन्न करती  हैं । कामाफ्लास किसी जीव की वह स्थिति होती है, जिसमें  वह अपने परिवेश से इतना घुल-मिल जाता है कि सरलता  से दिखाई नहीं देता । इससे उसे शिकार करने और सुरक्षित रहने में सुविधा होती है । सागरों और महासागरों में पाए जाने वाले कुछ जीव  आत्मरक्षा के लिए अपने प्रकाश उत्पादक अंगों से प्रकाश  उत्पन्न करते हैं । ये स्क्विड के समान अपने शरीर से एक

विशेष प्रकार का तरल रसायन छोड़ते हैं, जो पानी से  मिलकर नमकीला प्रकाश-सा उत्पन्न करता है । इससे  इनका शत्रु इन्हें देख नहीं पाता है और ये भागने में सफल हो  जाते हैं । इसी प्रकार प्लैंक्टन के जीव छोटी मछलियों से  बचने के लिए प्रकाश उत्पन्न करते हैं । वैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से प्रकाश उत्पन्न करने  वाले जीवों की जानकारी जीववैज्ञानिकों को प्राचीन काल  से है । इनका वैज्ञानिक अध्ययन सन १६०० के आस-पास  आरंभ हुआ । जीववैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि कुछ  जीव प्रकाश क्यों उत्पन्न करते हैं? कैसे प्रकाश उत्पन्न  करते हैं? अपने प्रकाश पर किस प्रकार नियंत्रण करते हैं?  आदि । सन १७९4 तक जीववैज्ञानिक यह समझते रहे कि समुद्री जीव फास्फोरस की सहायता से प्रकाश उत्पन्न करते  हैं, किंतु फास्फोरस विषैला पदार्थ होता है । यह जीवित कोशिकाओं में नहीं रह सकता । अत: इस मत को मान्यता  नहीं मिल सकी ।

 सर्वप्रथम सन १७९4 में इटली के एक वैज्ञानिक  स्पैलेंजानी ने यह सिद्ध किया कि समुद्री जीवों के शरीर से  उत्पन्न होने वाला प्रकाश ऑक्सीकरण के कारण उत्पन्न  होता है तथा इसके लिए पानी आवश्यक है । इस प्रकार  स्पैलेंजानी ने यह सिद्ध कर दिया कि जीवों द्वारा प्रकाश  उत्पन्न करने की क्रिया एक साधारण रासायनिक क्रिया है । इस खोज के एक लंबे समय बाद सन १88७ में  फ्रांसिसी वैज्ञानिक थिबाइस (Thibais) ने रासायनिक  विश्लेषण करके वह मालूम किया कि प्रकाश उत्पन्न करने  वाले जीव दो पदार्थों ल्यूसीफेरिन और ल्यूसीफेरैस की  सहायता से प्रकाश उत्पन्न करते हैं । विज्ञान के क्षेत्र में इस  उपलब्धि को अत्यंत महत्त्वपूर्णमाना गया । सन १8९4 में प्रोफेसर अलिरक डाहलगैट ने प्रकाश  उत्पन्न करने वाले जीवों के प्रकाश उत्पादक अंगों का सूक्ष्म अध्ययन किया । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जीव के  प्रत्येक प्रकाश उत्पादक अंग में एक लैंस होता है जो प्रकाश  को बाहर फेंकता है । जीववैज्ञानिकों द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने वाले  जीवों के प्रकाश से संबंधित खोजों ने प्रकाश उत्पन्न करने  वाले नये-नये जीवों के खोजकार्य को प्रोत्साहन दिया ।

  अत: इस प्रकार के अनेक जीवों की खोज हुई । डच ईस्ट इंडीज के पास सागर में प्रकाश उत्पन्न करने वाली दो  विशिष्ट मछलियाँ पाई जाती हैं । इनके शरीर पर प्याले के  स्वरूप के कुछ अवयव होते हैं, जिनमें एक विशेष जाति के  प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवाणु रहते हैं । इन्हें न तो  मछली के शरीर से अलग किया जा सकता है, न ही इन्हें  प्रयोगशाला में संवर्धित (Enlarged or Magnified) कर  सकते हैं, जबकि प्रकाश उत्पन्न करने वाले अन्य जीवाणुओं  को प्रयोगशाला में संवर्धित किया जा सकता है । सागर की सतह पर कभी-कभी किलोमीटर के क्षेत्र में प्रकाश दिखाई देता है । इस प्रकाश के संबंध में अनेक  मत प्रचलित थे । सर्वप्रथम सन १९१० में मैक कार्टनीम ने  यह खोज की । यह प्रकाश प्लैंक्टन के अत्यंत छोटे-छोटे  जीवों द्वारा उत्पन्न किया जाता है । जीववैज्ञानिकों ने कुछ समय पूर्व जापान के सागर  टों पर पाए जाने वाले एक स्क्विड (Firefly Squid) की  खोज की है । 

इसे जापानी भाषा में ‘होटारूइका’ कहते हैं ।  इसकी संस्पर्शिकाओं (Tentacles) के सिरों पर प्रकाश  उत्पादक अंग होते हैं । यह रोचक तथ्य है । इसी प्रकार  इटली के सागर तटों पर तल में हिटेरोट्यूथिम नामक प्रकाश  उत्पन्न करने वाला जीव पाया जाता है, जिसके प्रकाश  उत्पादक अंग नहीं होते । यह अपने शरीर से एक द्रव पदार्थ छोड़ता है, जो पानी के संपर्क में आते ही प्रकाश में बदल  जाता है और चमकने लगता है । धरती पर पाए जाने वाले प्रकाश उत्पादक जीवों की  संख्या बहुत है । इनमें आक्टोपस, एंगलर मछलियाँ,  कटलफिश, कनखजूरा, कार्डिनल मछली, क्रिल,  कोपपाड, क्लाम, जुगनू, जेलीफिश, टोड मछली, धनुर्धारी  मछली, नलिका कृमि, पिडाक, वाम्बेडक मछली,  ब्रिसलमाउथ, भंगुरतारा, मूँगा, लालटेल मछली, वाइपर  मछली, शंबुक, शल्ककृमि, समुद्री कासनी, समुद्री स्लग,  समुद्री स्क्विर्ट, स्क्विड, व्हेल मछली आदि प्रमुख हैं । जीव  वैज्ञानिक अभी भी प्रकाश उत्पन्न करने वाले नये-नये जीवों  की खोज कर रहे हैं तथा इनके द्वारा उत्पन्न किए जाने  वाले प्रकाश पर शोध कार्य कर रहे हैं । इससे आशा है कि इस प्रकार के जीवों और इनके द्वारा उत्पन्न किए जाने  वाले प्रकाश के संबंध में शीघ्र ही नई-नई रोचक जानकारियाँ प्राप्त होंगी ।

प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव स्वाध्याय | Prakash Utpann Karne Wale Jeev 

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