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सुनो किशोरी - सुनो किशोरी स्वाध्याय | Suno kishoree svaadhyaay [ 12th कृती और स्वाध्याय ]

सुनो किशोरी स्वाध्याय | Suno kishoree svaadhyaay


अंतर स्पष्ट कीजिए:- 

आकलन | Q 1 | Page 45
अ.क्र.रूढ़िपरंपरा
१.____________________________
२.____________________________
SOLUTION

अ.क्र.रूढ़िपरंपरा
१. रूढ़ि स्थिर होती है।परंपरा निरंतर गतिशील है।
२.रूढ़ि ऐसी रीति-नीति है, जो समय के साथ अपना अर्थ खो चुकी है।परंपरा समय के साथ बहती धारा है, जो उपयोगी हो गए मूल्यों को छोड़कर उपयोगी मूल्यों के साथ आगे बढ़ती है।

कारण लिखिए:-

आकलन | Q 2.1 | Page 45
1) सुगंधा का पत्र पाकर लेखिका को खुशी हुई
SOLUTION
सुगंधा का पत्र पाकर लेखिका को खुशी हुई क्योंकि सुगंधा लेखिका की पुत्री थी।

2) पश्चिमी मूल्य रूपी फल हमारे किसी काम के नहीं होंगे
SOLUTION
जिस प्रकार हर पौधे को पनपने, फलने-फूलने के लिए विशेष प्रकार की भूमि की आवश्यकता होती है, हर पौधा हर स्थान पर नहीं पनप सकता, उसी प्रकार हर देश व संस्कृति और समाज के मूल्य भी अलग होते हैं। पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण भारतीय समाज के लिए अग्राह्य होगा।

शब्द युग्म को पाठ केआधार पर पूर्ण कीजिए :- 

शब्द संपदा | Q 1 | Page 45
1) क्षत - ________
SOLUTION
क्षत - विक्षत

2) आदान - _______
SOLUTION
आदान - प्रदान

3) सूझ - ________
SOLUTION
सूझ - समझ

4) सोच - ________
SOLUTION
सोच - समझ

अभिव्यक्ति 

अभिव्यक्ति | Q 1 | Page 45
1) ‘विद्‌यार्थी जीवन में मित्रता का महत्त्व’, इस विषय पर अपना मंतव्य लिखिए ।
SOLUTION
विद्यार्थी जीवन स्वतंत्र जीवन होता है। यह ऐसा महत्त्वपूर्ण समय होता है, जिसमें विद्यार्थी चाहे तो अच्छा इनसान बन सकता है और बिगड़ना चाहे तो बिगड़ सकता है। यह ऐसी अवस्था है, जब एक युवा या युवती के विकास में उसके संगी साथियों का बहुत अधिक प्रभाव होता है। यदि इस समय अच्छे विद्यार्थियों से मित्रता होगी, तो वह भविष्य में अच्छा ही रहेगा और यदि उसकी संगति बुरे विद्यार्थियों से होगी तो उस पर भी बुरी संगत का असर होगा और वह भी अपने लक्ष्य से भटक जाएगा। सच्चा मित्र हमारे सुख-दुख में सदैव हमारा साथ देता है। हमारी उलझनों, परेशानियों को दूर करने में हमारी सहायता करता है।

2) 'युवा पीढ़ी किस ओर', इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
SOLUTION
युवा वर्ग किसी भी समाज व देश के लिए आशा की किरण होता है। देशवासी युवाओं में देश का भविष्य देखते हैं। परंतु आज की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों को तो काट फेंकना चाहती है परंतु पश्चिमी संस्कृति के पीछे दीवानी हो रही है। युवा पीढ़ी कर्तव्य-पालन के समय देशों के उदाहरण दिया करती है। वहाँ युवक-युवती प्रारंभ से ही अपनी अलग गृहस्थी बसा लेते हैं। परंतु ये लोग इस तथ्य को नकार देते हैं कि वहाँ बहुत छोटी अवस्था से ही किशोर-किशोरी स्वावलंबी हो जाते हैं। वे अपने पोषण के लिए माता-पिता पर निर्भर नहीं करते। प्रत्येक संस्कृति के जीवन-मूल्य अलग होते हैं। भारतीय युवाओं को यह तथ्य समझना चाहिए।

3) 'उड़ो बेटी, उड़ो ! पर धरती पर निगाह रखकर', इस पंक्ति में निहित सुगंधा की माँ के विचार स्पष्ट कीजिए।
SOLUTION
उड़ो बेटी, उड़ो पर धरती पर निगाह रखकर के द्वारा लेखिका का कहना है कि सपने देखना, उन्हें पूरा करने का प्रयास करना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। परंतु हमें अपनी महान सभ्यता, अपनी संस्कृति व अपने जीवन मूल्यों को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। अपनी धरती से, अपनी जड़ों से कटकर कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक सुखी नहीं रह पाता। जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब पीछे छोड़ दिए गए रिश्ते और लोग हमें याद आते हैं और हमें व्याकुल कर जाते हैं।

4) पाठ के आधार पर रूढी-परंपरा तथा मूल्यों के बारे में लेखिका के विचार स्पष्ट कीजिए।
SOLUTION
समय के साथ अपना अर्थ खो चुकी या वर्तमान प्रगतिशील समाज को पीछे ले जाने वाली समाज की कोई भी रीति-नीति रूढ़ि है। रूढ़ि स्थिर होती है। जबकि परंपरा समय के साथ अनुपयोगी हो गए मूल्यों को छोड़ती और उपयोगी मूल्यों को जोड़ती निरंतर बहती धारा परंपरा है। परंपरा गतिशील है। एक निरंतर बहता निर्मल प्रवाह, जो हर सड़ी-गली रूढ़ि को किनारे फेंकता और हर भीतरी-बाहरी, देशी-विदेशी उपयोगी मूल्य को अपने में समेटता चलता है।

5) आशारानी व्होरा जी के लेखन कार्य का प्रमुख उद्देश्य -
SOLUTION
विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी रही महिलाओं के जीवन संघर्ष को चित्रित करना और वर्तमान नारी वर्ग के सम्मुख उनके आदर्श प्रस्तुत करना।

6) आशारानी व्होरा जी की रचनाएँ - 
SOLUTION
(१) भारत की प्रथम महिला
(२) स्वतंत्रता सेनानी लेखिकाएँ
(३) क्रांतिकारी किशोरी
(४) स्वाधीनता सेनानी
(५) लेखक पत्रकार

कोष्ठक मेंदी गई सूचना केअनुसार अर्थ केआधार पर वाक्य परिवर्तन करके फिर से लिखिए :

साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान | Q 1 | Page 46
1) मनुष्य जाति की नासमझी का इतिहास क्रू और लंबा है । (प्रश्नार्थक वाक्य)
SOLUTION
क्या मनुष्य जाति की नासमझी का इतिहास क्रूर और लंबा है?

2) दया निर्बल थी, वह इतना भार सहन न कर सकी। (निषेधात्मक वाक्य)
SOLUTION
दया सबल नहीं थी, वह इतना भार सहन न कर सकी।

3) अपनी समस्याओं पर माँ से खुलकर बात करके उनसे सलाह ले। (प्रश्नात्मक वाक्य)
SOLUTION
क्या अपनी समस्याओं पर माँ से खुलकर बात करके उनसे सलाह लेती है?

4) मेरे साथ न्याय नहीं हुआ है। (विधि वाक्य)
SOLUTION
मेरे साथ न्याय करें।

5) शेष आप इस लिफाफे को खोलकर पढ़ लीजिए। (आज्ञार्थक वाक्य)
SOLUTION
शेष आप इस लिफाफे को खोलकर पढ़ो।

6) ऐसे समय वह तुम्हारी बात न सुने। (विधि वाक्य)
SOLUTION
ऐसे समय वह तुम्हारी बात सुने।

7) वे निरर्थक हैं तो फिर सार्थक क्या है? (विधानार्थक वाक्य)
SOLUTION
 वे निरर्थक हैं।

8) में तुम्हें खिलौना समझता रहा और तुम साँप निकले। (विस्मयादिबोधक वाक्य) 
SOLUTION
अच्छा में तुम्हें खिलौना समझता रहा और तुम साँप निकले।

9) इस क्षेत्र में भी रोजगार की भरपूर संभावनाएँ हैं। (निषेधात्मक वाक्य)
SOLUTION
इस क्षेत्र में रोजगार की भरपूर संभावनाएँ नहीं हैं।

10) आप भी तो एक विख्यात फीचर लेखक हैं। (विस्मयादिबोधक वाक्य)
SOLUTION
आप एक विख्यात फीचर लेखक हैं!

सुनो किशोरी स्वाध्याय | Suno kishoree svaadhyaay

लेखक परिचय ः श्रीमती आशारानी व्होरा जी का जन्म ७ अप्रैल १९२१ को अविभाजित भारत के झेलम जिले की तकवाल  तहसील स्थित ग्राम दुलहा में हुआ । आधुनिक हिंदी साहित्य में नारी विषयक लेखन में आप अपना अलग स्थान रखती हैं ।  प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आपके लेख धारावाहिक रूप से छपते रहे । विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी रहीं महिलाओं के जीवन संघर्ष को चित्रित करना और वर्तमान नारी वर्ग के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत करना आपके लेखन कार्य का प्रमुख उद्देश्य रहा है ।  आपकी रचनाओं ने लेखन की नयी धारा को जन्म दिया है और हिंदी साहित्य में नारी विमर्श लेखन की परंपरा को समृद्ध  किया है । आप अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं । आपका निधन २००९ में हुआ ।

प्रमुख कृतियाँ ः ‘भारत की प्रथम महिलाएँ’, ‘स्वतंत्रता सेनानी लेखिकाएँ’, ‘क्रांतिकारी किशोरी’, ‘स्वाधीनता सेनानी’,  ‘लेखक-पत्रकार’ आदि । 

विधा परिचय ः अनेक साहित्यकारों, महान राजनीतिकों द्वारा अपने परिजनों को भेजे गए पत्रों ने तत्कालीन साहित्यिक,  सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्थितियों का लेखा-जोखा प्रखरता से प्रस्तुत किया है । इन पत्रों का कला पक्ष साहित्यिक  कलात्मकता को स्पर्श करता है । 

पाठ परिचय ः लेखिका ने अपनी इस नवीनतम पत्र शैली में किशोरियों की शंकाओं, प्रश्नों एवं दुश्चिंताओं का समाधान एक  माँ, अंतरंग सहेली और मार्गदर्शिका के रूप में किया है । किशोरियों के हृदय में झाँककर मित्रवत उन्हें उचित अनुचित,  करणीय-अकरणीय का बोध कराया है । हमारे देश की नयी पीढ़ी पश्चिमी देशों से आ रहे मूल्यों और संस्कारों का अंधानुकरण करती जा रही है । हमारे देश की संस्कृति और परंपराओं को कालबाह्य और त्याज्य मानकर उनकी अवहेलना कर रही है ।  आत्मनिर्भर हो जाने से युवक-युवतियों का जीवन के प्रति बदला दृष्टिकोण, विवेकहीनता और जल्दबाजी में लिया जाने  वाला निर्णय नयी पीढ़ी का जीवनसौंदर्य नष्ट कर रहा है । लेखिका के अनुसार नये मूल्यों को भारतीय संस्कृति, परंपराओं  और संस्कारों की भूमि पर उतारकर स्वीकारना होगा ।

सुनो किशोरी स्वाध्याय | Suno kishoree svaadhyaay

सुनो सुगंधा ! तुम्हारा पत्र पाकर खुशी हुई । तुमने  दोतरफा अधिकार की बात उठाई है, वह पसंद आई ।  बेशक, जहाँजिस बात से तुम्हारी असहमति हो; वहाँतुम्हें  अपनी बात मुझे समझाने का पूरा अधिकार है । मुझे खुशी  ही होगी तुम्हारे इस अधिकार प्रयोग पर । इससे राह खुलेगी  और खुलती ही जाएगी । जहाँ कहीं कुछ रुकती दिखाई  देगी; वहाँ भी परस्पर आदान-प्रदान से राह निकाल ली  जाएगी । अपनी-अपनी बात कहने-सुनने में बंधन या  संकोच कैसा?  मैंने तो अधिकार की बात यों पूछी थी कि मैं उस बेटी  की माँ हूँ जो जीवन में ऊँचा उठने के लिए बड़े ऊँचे सपने  देखा करती है; आकाश में अपने छोटे-छोटे डैनों को चौड़े  फैलाकर । धरती से बहुत ऊँचाई में फैले इन डैनों को यथार्थ से  दूर समझकर भी मैं काटना नहीं चाहती । 

केवल उनकी डोर  मजबूत करना चाहती हूँकि अपनी किसी ऊँची उड़ान में वे  लड़खड़ा न जाएँ । इसलिए कहना चाहती हूँकि ‘उड़ो बेटी,  उड़ो, पर धरती पर निगाह रखकर ।’ कहीं ऐसा न हो कि धरती से जुड़ी डोर कट जाए और किसी अनजाने-अवांछित स्थल पर गिरकर डैने क्षत-विक्षत हो जाएँ । ऐसा नहीं होगा  क्योंकि तुम एक समझदार लड़की हो । फिर भी सावधानी  तो अपेक्षित है ही । यह सावधानी का ही संकेत है कि निगाह धरती पर  रखकर उड़ान भरी जाए । उस धरती पर जो तुम्हारा आधार  है- उसमें तुम्हारे परिवेश का, तुम्हारे संस्कार का, तुम्हारी  सांस्कृतिक परंपरा का, तुम्हारी सामर्थ्य का भी आधार जुड़ा  होना चाहिए । हमें पुरानी-जर्जर रूढ़ियों को तोड़ना है,  अच्छी परंपराओं को नहीं । परंपरा और रूढ़ि का अर्थ समझती हो न तुम? नहीं !  तो इस अंतर को समझने के लिए अपने सांस्कृतिक आधार

से संबंधित साहित्य अपने कॉलेज पुस्तकालय से खोजकर  लाना, उसे जरूर पढ़ना । यह आधार एक भारतीय लड़की  के नाते तुम्हारे व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा है, इसलिए । बदले वक्त के साथ बदलते समय के नये मूल्यों को  भी पहचानकर हमें अपनाना है पर यहाँ ‘पहचान’ शब्द को  रेखांकित करो । बिना समझे, बिना पहचाने कुछ भी नया  अपनाने से लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ सकती है । पश्चिमी दुनिया का हर मूल्य हमारे लिए नये मूल्य का  पर्याय नहीं हो सकता । हमारे बहुत-से पुराने मूल्य अब इतने  टूट-फूट गए हैं कि उन्हें भी जैसे-तैसे जोड़कर खड़ा करने  का मतलब होगा, अपने आधार को कमजोर करना । या यूँ भी कह सकते हैं कि अपनी अच्छी परंपराओं को रूढ़ि में  ढालना । समय के साथ अपना अर्थ खो चुकी या वर्तमान  प्रगतिशील समाज को पीछे ले जाने वाली समाज की कोई  भी रीति-नीति रूढ़ि है, समय के साथ अनुपयोगी हो गए  मूल्यों को छोड़ती और उपयोगी मूल्यों को जोड़ती निरंतर  बहती धारा परंपरा है, जो रूढ़ि की तरह स्थिर नहीं हो  सकती । यही अंतर है दोनों में । रूढ़ि स्थिर है, परंपरा निरंतर  गतिशील । एक निरंतर बहता निर्मल प्रवाह, जो हर  सड़ी-गली रूढ़ि को किनारे फेंकता और हर भीतरी-बाहरी,  देशी-विदेशी उपयोगी मूल्य को अपने में समेटता चलता  है । 

इसीलिए मैंने पहले कहा है कि अपने टूटे-फूटे मूल्यों  को भरसक जोड़कर खड़ा करने से कोई लाभ नहीं, आज  नहीं तो कल, वे जर्जर मूल्य भरहराकर गिरेंगे ही । इसी तरह पश्चिमी मूल्य भी, जो हमारी धरती के  अनुकूल नहीं हैं, ज्यों-के-त्यों यहाँ नहीं उगाए जा सकते । उगाएँगे, तो वे पौधे फलीभूत नहीं होंगे । होंगे, तो जल्दी झड़  जाएँगे । वे फल हमारे किसी काम के नहीं होंगे ।  मुझे लगता है, पत्र का यह अंश आज तुम्हारे लिए  कुछ भारी हो गया । बेहतर है, अपनी संस्कृति व परंपरा को  ठीक से समझने के लिए फुरसत के समय इससे संबंधित साहित्य पढ़ना । इसलिए कि यह बुनियादी जानकारी हर  भारतीय लड़की के लिए जरूरी है, जिससे वह अपनी धरती,  अपनी जड़ों को अच्छी तरह पहचान सके । यहाँ तुम्हारी सहेली रचना के संदर्भ में यह प्रसंग  इसलिए कि वह इस सीमारेखा को नहीं समझ पा रही । एक चना का ही संघर्ष नहीं है यह, एक पूरी पीढ़ी का संघर्ष है । नयी पीढ़ी पुराने मूल्यों को तो काट फेंकना चाहती है पर  नये मूल्यों के नाम पर केवल पश्चिमी मूल्यों को ही  जानती-पहचानती है । कहें, उधार लिए मूल्यों से ही काम चला लेना चाहती है । नये मूल्यों के निर्माण का दम-खम अभी उसमें नहीं आया है । सुनो, नये मूल्यों का निर्माण करना है तो नये  ज्ञान-विज्ञान को पहले अपनी धरती पर टिकाना होगा ।

अपनी सामर्थ्य और अपनी सीमाओं में से ही उसकी पगडंडी  काटनी होगी । यह पगडंडी काटने का साहस ही पहले  जरूरी है, नयी चौड़ी राह उसी में से खुलती दिखाई देगी ।  तुम अपनी सहेली रचना को यह समझाओ कि क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, कोई छोटी-सी क्रांति भी कर दिखाना कठिन है और एक ही झटके में यूँ टूट-हारकर बैठ जाना तो निहायत मूर्खता है । फिर अभी तो  वह प्रथम वर्ष के पूर्वार्धमें ही है । अभी से उसे ऐसा कोई  कदम नहीं उठाना चाहिए । जरूरी हो तो सोच-समझकर वे अपनी दोस्ती को आगे बढ़ा सकते हैं । कॉलेज जीवन की पूरी अवधि में वे निकट मित्रों की  तरह रहकर एक-दूसरे को देखें-जानें, जाँचें-परखें ।  एक-दूसरे की राह का रोड़ा नहीं, प्रेरणा और ताकत बनकर  परस्पर विकास में सहभागी बनें । फिर अपनी पढ़ाई की  समाप्ति पर भी यदि वे एक-दूसरे के साथ पूर्ववत लगाव  महसूस करें, उन्हें लगे कि निकट रहकर सामने आईं  कमियों-गलतियों ने भी उनकी दोस्ती में कोई दरार नहीं  डाली है, तो वे एक-दूसरे को उनकी समस्त  खूबियों-कमियों के साथ स्वीकार कर अपना लें ।  उस स्थिति में की गई यह कथित क्रांति न कठिन होगी,  न असफल ।
 
मेरी राय में रचना को और उसके दोस्त को तब तक  धैर्य से प्रतीक्षा करनी चाहिए । इस बीच वे पूरे जतन के साथ एक-दूसरे के लिए स्वयं को तैयार करें । बिना तैयारी के  जल्दबाजी में, पढ़ाई के बीच शादी का निर्णय लेना केवल  बेवकूफी ही कही जा सकती है, क्रांति नहीं । ऐसी कथित क्रांति का असफल होना निश्चित ही समझना चाहिए ।  इतनी जल्दबाजी में तो किसी छोटे-से काम के लिए उठाया  कोई छोटा कदम भी शायद ही सफल हो । यह तो जिंदगी  का अहम फैसला है ।
 
मैं समझती हूँ, रचना की इस मूर्खतापूर्ण ‘क्रांति’ में  उसकी सहायता न करने का तुम्हारा निर्णय एक सही निर्णय  है पर तटस्थ रहना ही काफी नहीं है । यदि रचना सचमुच  तुम्हारी प्यारी सहेली है तो उसका हित-अहित देखना भी  तुम्हारा काम है, उसमें हस्तक्षेप करना भी । पर रचना को इसके लिए दोष देने व उसकी भर्त्सना  करने से भी बात नहीं बनेगी, बिगड़ जरूर सकती है ।  हो सकता है, कथित प्यार के जुनून में इसका उलटा असर  हो और वह तुम्हारी बात का बुरा मानकर तुमसे कन्नी काटने  लगे । इसलिए सँभलकर बात करनी होगी आैर सूझ-बूझ से  बात सँभालनी होगी । दोष अकेली रचना का है भी नहीं । दोष उसकी  नासमझ उम्र का है या उसके उस परिवेश का है, जिसमें उसे  सँभलकर चलने के संस्कार नहीं दिए गए हैं ।

 यह उम्र ही  ऐसी है जब कोई भावुक किशोरी किसी युवक की प्यार  भरी, मीठी-मीठी बातों के बहकावे में आकर उसे अपना  सब कुछ समझने लगती है और कच्ची, रोमानी भावनाओं  में बहकर जल्दबाजी में मूर्खता कर बैठती है । पछतावा उसे  तब होता है जब पानी सिर से गुजर चुका होता है । इस अल्हड़ उम्र में अगर वह लड़की अपने परिवार के  स्नेह संरक्षण से मुक्त है, आजादी के नाम पर स्वयं को  जरूरत से ज्यादा अहमियत देकर अंतर्मुखी हो गई है तो  उसके फिसलने की संभावना अधिक बढ़ जाती है । अपने  में अकेली पड़ गई लड़की जैसे ही किसी लड़के के संपर्क में  आती है, उसे अपना हमदर्द समझ बैठती है और उसके  बहकने की, उसके कदम भटकने की संभावना और भी बढ़  जाती है । लगता है, अपने परिवार से कटी रचना के साथ ऐसा ही है । यदि सचमुच ऐसा है तो तुम्हें और भी सावधानी  से काम लेना होगा अन्यथा उसे समझाना मुश्किल होगा,  उलटे तुम्हारी दोस्ती में दरार आ सकती है ।

एक अच्छी सहेली के नाते तुम उसकी पारिवारिक  पृष्ठभूमि का अध्ययन करो । अगर लगे कि वह अपने  परिवार से कटी हुई है तो उसकी इस टूटी कड़ी को जोड़ने  का प्रयास करो । जैसे तुम मुझे पत्र लिखती हो, उससे भी  कहो; वह अपनी माँ को पत्र लिखे । अपने घर की,  भाई-बहनों की बातों में रुचि लें । अपनी समस्याओं पर माँ से खुलकर बात करे और उनसे सलाह ले । यदि उसकी माँ इस योग्य न हो तो वह अपनी बड़ी बहन या भाभी से निर्देशन  ले । यह भी संभव न हो तो अपनी किसी समझदार सहेली  या रिश्तेदार को ही राजदार बना ले । घर में किसी से भी  बातचीत का सिलसिला जोड़कर वह अपनी समस्या से  अकेले जूझने से निजात पा सकती है । नहीं तो तुम तो हो  ही । ऐसे समय वह तुम्हारी बात न सुने, तुम्हें झटक दे,  तब भी उसकी वर्तमान मनोदशा देखकर तुम्हें उसकी बात का बुरा नहीं मानना है । उसका मूड देखकर उसका मन  टटोलो और उसे प्यार से समझाओ ।


एक शुभचिंतक सहेली के नाते ऐसे समय तुम्हें उसे  इसलिए अकेला नहीं छोड़ देना है कि वह तुम्हारी बात नहीं  सुनती या तुम्हारी बात का बुरा मानती है । तुम साथ छोड़  दोगी तो वह और टूट जाएगी । अकेली पड़कर वह उधर ही  जाने के लिए कदम बढ़ा लेगी, जिधर जाने से तुम उसे  रोकना चाहती हो । यहीं पर तुम्हारे धैर्य और संयम की  परीक्षा है । अगर जरूरी समझो तो सहेली के कथित दोस्त या  प्रेमी लड़के से भी किसी समय बात कर सकती हो । उसकी  मंशा जानकर उससे अपनी सहेली को अवगत करा सकती  हो या आगाह कर सकती हो । यदि तुम्हें लगे कि लड़का निर्दोष है, निश्छल है,  अपने प्यार में सच्चा या अडिग लगता है तो दोनों को पढ़ाई  के अंत तक प्रतीक्षा करने और तब तक केवल दोस्त बने  रहने का परामर्श दे सकती हो । 

पर यहाँ भी तुम्हें सतर्कता बरतनी होगी । रचना को  विश्वास में लेकर दोस्ती के दौरान उससे कोई गलत कदम न उठाने का वायदा लेना होगा, वरना दूसरों की आग बुझाते  अपने हाथ जला लेना कोई अनहोनी या असंभव बात नहीं । इसीलिए मैंने कहा है, यह तुम्हारी सूझ-समझ की भी  परीक्षा होगी । और एक बात, यह मत समझना कि सलाह  केवल तुम बेटी हो इसलिए दी जा रही है, यही सलाह कोई  भी माँ अपने पुत्र को भी देगी । ये बातें बेटा-बेटी के लिए  समान रूप से लागू होती हैं ।   मैं इसके परिणाम की प्रतीक्षा करूँगी । अगले पत्र में  जानकारी देना । दोगी न ? - तुम्हारी माँ
(‘सुनो किशोरी’ पत्र संग्रह से)

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