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ठेस स्वाध्याय | ठेस स्वाध्याय pdf | thes Swadhyay Class 10 Hindi

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कृति

[कृतिपत्रिका के प्रश्न 3 [अ] के लिए]

सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

प्रश्न 1. संजाल पूर्ण कीजिए:
  1
SOLUTION :
ठेस स्वाध्याय |  ठेस स्वाध्याय pdf |  thes Swadhyay  Class 10 Hindi

प्रश्न 2. कृति पूर्ण कीजिए:
  2
SOLUTION :
  12
  22

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प्रश्न 3. वाक्यों का उचित क्रम लगाकर लिखिए:
a. सातों तारे मंद पड़ गए।
b. ये मेरी ओर से हैं। सब चीजें हैं दीदी।
c. लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं।
d. मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है।
SOLUTION :
a. सातों तारे मंद पड़ रहे हैं।
b. ये मेरी ओर से हैं। सब चीजें हैं दीदी!
c. लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं।
d. मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है।

[अभिव्यक्ति]

प्रश्न. ‘कला और कलाकार का सम्मान करना हमारा दायित्व है’, इस कथन पर अपने विचारों को शब्दबद्ध कीजिए।
SOLUTION :
हमारे देश की संस्कृति में लोक कलाओं की सशक्त पहचान रही है। ये मूलतः ग्रामीण अंचलों में अनेक जातियों व जनजातियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित पारंपरिक कलाएँ हैं। लोक कला का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि भारतीय ग्रामीण सभ्यता का। लोक कलाओं में लोकगीत, लोकनृत्य, गायन, वादन, अभिनय, मूर्तिकला, काष्ठकला, धातुकला, चित्रकला, हस्तकला आदि का समावेश होता है। हस्तकला ऐसे कलात्मक कार्य को कहते हैं, जो उपयोगी होने के साथ-साथ सजाने के काम आता है तथा जिसे मुख्यतः हाथ से या साधारण औजारों की सहायता से ही किया जाता है।

ऐसी कलाओं का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व होता है। वर्तमान में लोक कलाओं और कलाकारों को उचित प्रश्रय न मिलने के कारण अनेक लोक कलाओं पर संकट उत्पन्न हो गया है। धीरे-धीरे समय परिवर्तन, भौतिकतावाद, पश्चिमीकरण तथा आर्थिक संपन्नता के कारण परंपरागत लोक कलाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जनता व प्रशासन दोनों को ही लोक कलाओं और कलाकारों की पहचान नष्ट होने से बचाने के प्रयास करने चाहिए।


भाषा बिंदु


प्रश्न 1. कोष्ठक की सूचना के अनुसार निम्न वाक्यों का काल परिवर्तन कीजिए:

a. अली घर से बाहर चला जाता है। [सामान्य भूतकाल]
—————————————————————
b. आराम हराम हो जाता है। [पूर्ण वर्तमानकाल एवं पूर्ण भविष्यकाल]
—————————————————————
c. सरकार एक ही टैक्स लगाती है। [सामान्य भविष्यकाल]
—————————————————————
d. आप इतनी देर से नाप-तौल करते हैं। [अपूर्ण वर्तमानकाल]
—————————————————————
e. वे बाजार से नई पुस्तक खरीदते हैं। [पूर्ण भूतकाल एवं अपूर्ण भविष्यकाल]
—————————————————————
f. वे पुस्तक शांति से पढ़ते हैं। [अपूर्ण भूतकाल]
—————————————————————
g. सातों तारे मंद पड़ गए। [अपूर्ण वर्तमानकाल]
—————————————————————
h. मैंने खिड़की से गरदन निकालकर झिड़की के स्वर में कहा। [अपूर्ण भूतकाल]
—————————————————————
SOLUTION :
a. अली घर से बाहर चला गया।
b. [अ] आराम हराम हो गया है।
[ब] आराम हराम हो चुका होगा।
c. सरकार एक ही टैक्स लगाएगी।
d. आप इतनी देर से नाप-तौल कर रहे हैं।
e. [अ] उन्होंने बाजार से नई पुस्तक खरीदी थी।
[ब] वे बाजार से नई पुस्तक खरीदते रहेंगे।
f. वे पुस्तक शांति से पढ़ रहे थे।
g. सिरचन ने मुस्कराकर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया।
h. मैं खिड़की से गरदन निकालकर झिड़की के स्वर में कह रहा था।

 

प्रश्न 2. नीचे दिए गए वाक्य का काल पहचानकर निर्देशानुसार काल परिवर्तन कीजिए:
  3
SOLUTION :
मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था – अपूर्ण भूतकाल

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उपयोजित लेखन

प्रश्न. ‘पुस्तक प्रदर्शनी में एक घंटा’ विषय पर अस्सी से सौ शब्दों में निबंध लेखन कीजिए।
SOLUTION :
पुस्तकें अनमोल होती हैं। वे हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं, क्योंकि वे ज्ञान-विज्ञान का भंडार होती हैं। व्यक्ति आते हैं और चले जाते हैं परंतु उनके श्रेष्ठ विचार, ज्ञान, संस्कृति, सभ्यता, मानवीय मूल्य पुस्तकों के रूप में जीवित रहते हैं। पुस्तक प्रदर्शनी और मेले हमारे लिए वरदान हैं। ये पाठकों और लेखकों का संगम होते हैं। प्रत्येक वर्ष अगस्त में पुणे में कोरेगाँव पार्क में पुस्तक प्रदर्शनी और मेले का आयोजन किया जाता है। अनेक पुस्तक विक्रेता और प्रकाशक वहाँ आते हैं। इस बार मैं भी उस प्रदर्शनी में गया।

स्टालों पर पुस्तकें बड़े आकर्षक ढंग से सजी हुई थीं। सभी स्तर और रुचि के लोगों के लिए वहाँ यथेष्ट सामग्री थी। इतिहास, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, धर्म, भाषा, यात्रा, जीवन-वृत्त आदि सभी विषयों की पुस्तकें वहाँ थीं। अनेक स्कूलों के विद्यार्थी वहाँ आए हुए थे। बच्चे-बड़े सभी पुस्तकें खरीदने में व्यस्त थे या उनको देख-पढ़ रहे थे। कुछ लोग ग्रुप में खड़े पुस्तकों पर चर्चा कर रहे थे। मेरे पास समय का अभाव था। मैंने अपने और छोटे भाई के लिए मुंशी प्रेमचंद का कहानी-संग्रह तथा हिंदी का एक शब्दकोश खरीदा।


गद्यांश क्र. 1

प्रश्न. निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

कृति 1: [आकलन]

प्रश्न 1. कारण लिखिए:
गाँव के लोग अब सिरचन को खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए इसलिए नहीं बुलाते:
SOLUTION :
लोग उसको बेकार ही नहीं, बेगार’ समझते हैं। दूसरे मजदूर खेत पर पहुँचकर एक-तिहाई काम कर चुकते हैं, तब पगडंडी पर तौल-तौलकर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता हुआ दिखाई पड़ेगा।

प्रश्न 2. वाक्यों को उचित क्रम लगाकर लिखिए:
[i] तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनाना सीखी हैं?
[ii] लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं।
[iii] मुफ्त में मजदूरी देनी हो, तो और बात है।
SOLUTION :
[i] मुफ्त में मजदूरी देनी हो, तो और बात है।
[ii] मैं पहले ही पूछ लेता, भोग क्या-क्या लगेगा?
[iii] तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनाना सीखी है?

प्रश्न 3. संजाल पूर्ण कीजिए:
  4
SOLUTION :
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प्रश्न 4. एक शब्द में उत्तर लिखिए:
[i] बिना मजदूरी दिए जबरदस्ती लिया गया काम – …………………………..
[ii] बाँस की तीलियों से बना परदा – …………………………..
SOLUTION :
[i] बिना मजदूरी दिए जबरदस्ती लिया गया काम- बेगार।
[ii] बाँस की तीलियों से बना परदा- चिक।

कृति 2: [स्वमत अभिव्यक्ति]

प्रश्न. ‘खेत-खलिहान की मजदूरी इस विषय में 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए।
SOLUTION :
भारत गाँवों और खेतों का देश है। यहाँ आज भी देश की दो-तिहाई जनता खेती से जुड़ी है। खेत हैं, खेती है तो मजदूर भी जरूरी हैं। मजदूर और किसान एक-दूसरे के पूरक हैं। मजदूर के बिना किसानों का काम असंभव-सा होता है। फसल की बुआई, गुड़ाई, निराई, सिंचाई आदि के काम के लिए मजदूरों की आवश्यकता होती ही है। भूमिहीन मजदूर परिवार बहुत गरीब होते हैं। उनके पास अपनी जमीन नहीं होती। उन्हें रोजी-रोटी के लिए दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता है। फसल की बुआई और कटाई के समय तो बड़े किसानों के खेतों में उन्हें काम और मजदूरी मिल जाती है, परंतु पूरे वर्ष काम नहीं मिल पाता। ऐसे समय इन मजदूरों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए मजदूरी के अन्य कार्य करने पड़ते हैं। बार-बार कर्ज लेना पड़ता है।

गद्यांश क्र. 2 

प्रश्न, निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
कृति 1: [आकलन]

प्रश्न 1. कृति पूर्ण कीजिए:
 Maharashtra Board Class 10 Hindi Solutions Chapter 10 ठेस 8
SOLUTION :
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प्रश्न 2. गलत वाक्य सही करके लिखिए:
[i] दूध, घी, मलाई न मिले तो कोई बात नहीं किंतु बात में जरा भी झाला सिरचन नहीं बरदाश्त कर सकता।
[ii] आज तो अब अधकपाली दर्द के कारण मन ठीक नहीं है। थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आकर पूरा कर दूंगा।
SOLUTION :
[i] दूध में कोई मिठाई न मिले तो कोई बात नहीं किंतु बात में जरा भी झाला सिरचन नहीं बरदाश्त कर सकता।
[ii] आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आकर पूरा कर दूंगा।

प्रश्न 3.आकृति पूर्ण कीजिए:
[i] सिरचन जाति का यह है – [ ]
[ii] बिना इसके पेट भर भात पर काम करने वाला कारीगर – [ ]
[iii] सिरचन को लोग यह भी समझते हैं – [ ]
[iv] ऐसे बहुत-से काम हैं जिन्हें इसके सिवा गाँव में कोई नहीं जानता – [ ]
SOLUTION :
[i] सिरचन जाति का यह है – [कारीगर]
[ii] बिना इसके पेट भर भात पर काम करने वाला कारीगर – [मजदूरी]
[iii] सिरचन को लोग यह भी समझते हैं – [चटोर]
[iv] ऐसे बहुत-से काम हैं जिन्हें इसके सिवा गाँव में कोई नहीं जानता – [सिरंचन]

प्रश्न 4. कृति पूर्ण कीजिए:
  10
SOLUTION :
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गद्यांश क्र. 3.

प्रश्न. निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
कृति 1: [आकलन]

प्रश्न 1. संजाल पूर्ण कीजिए:
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SOLUTION :
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प्रश्न 2. वाक्यों को उचित क्रम लगाकर लिखिए:
[i] मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है।
[ii] मँझली भाभी का मुँह लटक गया।
[iii] मॅझली भाभी से रहा नहीं गया।
SOLUTION :
[i] रंगीन सुतलियों में झब्बे डालकर सिरचन चिक बुनने बैठा।
[ii] मैंझली भाभी से रहा नहीं गया।
[iii] मँझली भाभी का मुँह लटक गया।

प्रश्न 3. कारण लिखिए:
मझली भाभी का मुँह लटक गया –
SOLUTION :
मझली भाभी का प्रस्ताव सुनकर सिरचन ने कहा कि बहुरिया, मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुर्ता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती। मानू दीदी का दूल्हा अफसर है। सिरचन की बात सुनकर मझली भाभी का मुँह लटक गया।

प्रश्न 4. वाक्य पूर्ण कीजिए:
[i] मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को –
[ii] मोहर छापवाली धोती नहीं, मुंगिया लड्डू, बेटी की बिदाई के समय –
SOLUTION :
[i] मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को लिखकर चेतावनी दे दी है।
[ii] मोहर छापवाली धोती नहीं, मुँगिया लड्डू, बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी।

प्रश्न 5. कृति पूर्ण कीजिए:
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SOLUTION :
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कृति 2: [स्वमत अभिव्यक्ति]

प्रश्न. ‘मन लगाकर काम करना एक गुण है’ इस विषय में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।
SOLUTION :
किसी भी काम को मन लगाकर अर्थात तन्मयता से करना एक गुण है। उसका फल भी हमें मिलता है। मन लगाकर किए गए काम के परिणाम हमेशा उत्तम होते हैं। जिस काम को करने में मन लगता है, वह कभी बोझ नहीं लगता। जो काम मन मारकर करना पड़े, वह बोझ बन जाता है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो एक किनारे खड़े होकर नाव की तलाश करते हैं अर्थात उचित काम और अवसर की तलाश करते रहते हैं और वह अवसर कभी नहीं आता, वे जिंदगी भर इंतजार ही करते रहते हैं। कुछ लोग नौकरी में मन लगाकर काम ही नहीं करना चाहते। दूसरे साथी जब मेहनत और लगन से काम करके प्रोन्नति पाकर आगे बढ़ जाते हैं, तो ईष्या के वश होकर उन्हें अधिकारियों का चमचा आदि कहते हैं।

 

गद्यांश क्र. 4

प्रश्न. निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
कृति 1: [आकलन]

प्रश्न 1. ये वाक्य किसने, किससे कहे हैं? लिखिए:
[i] आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है?
[ii] अरी मँझली, सिरचन को बुंदिया क्यों नहीं देती?
[iii] बँदिया मैं नहीं खाता, काकी!
[iv] किसी के नैहर-ससुराल की बात क्यों करेगा वह?
SOLUTION :
[i] आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है? – लेखक ने माँ से कहा है।
[ii] अरी मँझली, सिरचन को बुंदिया क्यों नहीं देती? – लेखक की माँ ने मँझली भाभी से कहा है।
[iii] बुंदिया मैं नहीं खाता, काकी- सिरचन ने लेखक की माँ से कहा है।
[iv] किसी के नैहर-ससुराल की बात क्यों करेगा वह? – चाची ने लेखक की माँ से कहा है।

प्रश्न 2. आकृति पूर्ण कीजिए:
[i] सिरचन को काम में मगन होकर खाने-पीने की यह न रहती।। – [ ]
[ii] चिक में सुतली के फंदे डालकर सिरचन ने इस पर निगाह डाली। – [ ]
[iii] मानू यह सजाकर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। – [ ]
[iv] अरी मैंझली, सिरचन को यह क्यों नहीं देती। – [ ]
SOLUTION :
[i] सिरचन को काम में मगन होकर – खाने-पीने की यह न रहती। – [सुध]
[ii] चिक में सुतली के फंदे डालकर – सिरचन ने इस पर निगाह डाली। [सूप]
[iii] मानू यह सजाकर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। – [पान]
[iv] अरी मँझली, सिरचन को यह क्यों नहीं देती। – [बँदियाँ]

प्रश्न 3. संजाल पूर्ण कीजिए:
  19
SOLUTION :
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कृति 2: [स्वमत अभिव्यक्ति]

प्रश्न. ‘बहू के मायके की आलोचना करना उचित नहीं है इस विषय में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।।
SOLUTION :
कहा जाता है कि बेटियों का असली घर उनका ससुराल होता है। जिसे असली घर बताया जाता है, यानि कि ससुराल, वहाँ अकसर बहू को बेगाना समझा जाता है। ससुराल में बहू को कोई हक नहीं होता कि वह अपनी इच्छा से कुछ कर सके। हर छोटी-बड़ी बात के लिए उसे ससुरालवालों की आज्ञा की आवश्यकता होती है। बहू सबकी इच्छाओं का ख्याल रखती है, सबका सम्मान करती है, पर बहू का सम्मान अकसर नहीं किया जाता। स्थिति तब और भी भयंकर हो जाती है, जब ससुरालवाले समय-असमय बहू के मायके की आलोचना करने लगते हैं।

मायकेवालों ने क्या भेजा है, बहू क्या लाई है? आदि प्रश्न घरवाले ही नहीं, कभी-कभी अड़ोस-पड़ोसवालों की जुबान पर भी आने लगते हैं। लड़केवाले प्रायः समझते हैं कि उनका दर्जा लड़कीवालों से ऊँचा है। बात-बात पर बह के मायकेवालों की उपेक्षा की जाती है। उनमें मीन-मेख निकाली जाती है। परिणामस्वरूप, बहू के मन में ससुराल के प्रति विद्वेष की भावना आ जाती है। हमें बहू के मायकेवालों का सम्मान करना होगा। तभी बहू भी ससुरालवालों को सम्मान देगी। हमेशा उनसे कुछ लेने की अपेक्षा करना उचित नहीं है।

गद्यांश क्र.5

प्रश्न. निम्नलिखित पठित गद्यांश पढकर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
कृति 1: [आकलन]

प्रश्न 1. एक शब्द में उत्तर लिखिए:
*[i] सिरचन ने छोटी चाची से माँगा –
[ii] सिरचन की घरवाली ने यह बुनी थी –
SOLUTION :
[i] सिरचन ने छोटी चाची से माँगा – गमकौआ जर्दा।
[i] सिरचन की घरवाली ने यह बुनी थी – शीतलपाटी।

प्रश्न 2. वाक्यों को उचित क्रम लगाकर लिखिए:
[i] सिरचन ने मुस्कराकर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया।
[ii] चाची कई कारणों से जली-भुनी रहती थी सिरचन से।
[iii] बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए।
SOLUTION :
[ii] चाची कई कारणों से जली-भुनी रहती थी सिरचन से।
[ii] बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए।
[iii] सातों तारे मंद पड़ गए।

प्रश्न 3. कारण लिखिए:
[i] मेरा कलेजा धड़क उठा… हो गया सत्यानाश!
[ii] सातों तारे मंद पड़ गए।
SOLUTION :
[i] चाची ने सिरचन को बुरी तरह डाँटा था। मैं जानता था कि सिरचन बड़ा स्वाभिमानी है। अब वह मानू की ससुराल के लिए चिक और शीतलपाटी बनाएगा भी या नहीं।
[ii] सिरचन बड़ा स्वाभिमानी था। चाची ने उसे बुरी तरह डाँटा तो वह उस चिक को, जिसे उसने बड़े मन से बनाना शुरू किया था, अधूरी छोड़कर चला गया।

कृति 2: [स्वमत अभिव्यक्ति]

प्रश्न. सिरचन काम अधूरा छोड़कर चला गया। क्या यह उचित था’ इस विषय में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।
SOLUTION :
लेखक की चाची के बुरा-भला कहने पर सिरचन नाराज होकर काम अधूरा छोड़कर चला गया। इसे किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता। सिरचन अच्छी तरह जानता था कि चिक और पटेर की शीतलपाटियाँ मानू के अफसर दूल्हे की फरमाइश पर बनवाई जा रही हैं। मानू उन्हें लेकर ही ससुराल जाएगी। फिर भी उसने काम पूरा . नहीं किया और चला गया। यह सिरचन ने ठीक नहीं किया। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि दूल्हे की फरमाइश पूरी न होने की स्थिति में मानू को ताने सुनने पड़ सकते हैं। सास-ससुर व घर के अन्य सदस्यों की नाराजगी का शिकार होना पड़ सकता है। उस समय वह मानू, जिसके प्रति सिरचन के मन में भी स्नेह था, कितनी दुखी होगी। सिरचन का काम अधूरा छोड़कर जाना मुझे उचित नहीं लगा। [विद्यार्थी अपने ३ विचार लिखें।]

गद्यांश क्र. 6

प्रश्न. निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
कृति 1: [आकलन]

प्रश्न 1. ये वाक्य किसने, किससे कहे हैं? लिखिए:
[i] यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?
[ii] चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी!
[iii] मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखू।
[iv] ये मेरी ओर से हैं। सब चीजें हैं दीदी!
SOLUTION :
[i] यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू? – बड़ी भाभी ने मानू से कहा है।
[ii] चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी! – लेखक ने बड़ी भाभी से कहा है।
[iii] मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखू। – सिरचन ने लेखक से कहा है।
[iv] यह मेरी ओर से हैं। सब चीजें हैं दीदी! – सिरचन ने मानू से कहा है।


प्रश्न 2. वाक्यों को उचित क्रम लगाकर लिखिए:
[i] मानू फूट-फूटकर रो रही थी।
[ii] मानू कुछ नहीं बोली!… बेचारी!
[iii] मानू को ससुराल पहुँचाने में ही जा रहा था।
SOLUTION :
[i] मानू कुछ नहीं बोली!… बेचारी!
[ii] मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था।
[iii] मानू फूट-फूटकर रो रही थी।

प्रश्न 3. दो ऐसे प्रश्न बनाइए, जिनके उत्तर निम्नलिखित शब्द हों:
[i] सिरचन ने
[ii] मानू।
SOLUTION :
[i] किसने दाँत से जीभ को काटकर दोनों हाथ जोड़ दिए?
[ii] मोहर छापवाली धोती का दाम कौन देने लगी?

कृति 2: [स्वमत अभिव्यक्ति]


प्रश्न. ‘सिरचन भावनाओं से परिपूर्ण व्यक्ति था’ इस विषय में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।
SOLUTION :
सिरचन भावनाओं से परिपूर्ण व्यक्ति है। वह एक उच्चकोटि का कलाकार है। चिक, शीतलपाटी आदि बनाने में पूरे क्षेत्र में उसका कोई सानी नहीं है। लेखक का परिवार, विशेष रूप से उनकी माँ का सिरचन बहुत आदर करता है। लेखक की माँ भी सिरचन की कला का सम्मान करती है। शायद इसीलिए लेखक की चाची उससे जली-भुनी रहती है। भावुक होने के कारण सिरचन को किसी के द्वारा टोका जाना तनिक भी बर्दाश्त नहीं होता। इसीलिए चाची के बुरा-भला कहने पर वह नाराज होकर काम अधूरा छोड़कर चला जाता है।

परंतु सिरचन जानता है कि चिक, शीतलपाटी आदि सभी चीजों के लिए मानू के अफसर पति ने फरमाइश की थी। उसे मानू से स्नेह था। अतः नाराज होने के बावजूद वह मानू के लिए वे सारी चीजें बनाता है और इतनी सुंदर कि लेखक भी उसकी कारीगरी देखकर दंग रह जाता है। सिरचन स्वयं उन्हें लेकर स्टेशन आता है। मानू जब माँ द्वारा कही गई मोहर छापवाली धोती का दाम सिरचन को देना चाहती है तो वह दोनों हाथ जोड़कर मना कर देता है।

उपक्रम/कृति/परियोजना

प्रश्न. लेखनीय
लोक कलाओं के नामों की सूची तैयार कीजिए।
SOLUTION :
  • मधुबनी
  • जादोपाटिया
  • कलमकारी
  • कांगड़ा
  • गोंड
  • चित्तर
  • तंजावुर
  • थंगक
  • पातचित्र
  • पिछवई
  • पिथोरा
  • फड़
  • बाटिक
  • यमुनाघाट
  • वरली।

प्रश्न. पठनीय
देश की आत्मा गाँवों में बसती है, गांधी जी के इस विचार से संबंधित लेख पदिए तथा इस पर स्वमत प्रस्तुत कीजिए।
SOLUTION :
हमारा देश कृषिप्रधान देश है। यह गाँवों का देश है। भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। सरित-सरोवर, झील-जलाशय, विविध विटप, वन-पर्वत, खेत-खलिहान और सहज-स्वाभाविक जीवन शैली सब गाँवों में ही उपलब्ध हो सकती है। आज भी भारत की 65 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गाँवों में बसती है। परंतु देश के आर्थिक विकास का लाभ गाँववासियों को संख्या के अनुपात में नहीं मिल पाता। आज भी असंख्य गाँव देश की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाए हैं। गाँवों की समस्याएँ चाहे गरीबी हो, सामाजिक हो, पेयजल हो या बिजली, सड़क, शिक्षा आदि हों, इन्हें कभी भी गंभीर रूप से नहीं लिया गया। शहर के निकट बसे गाँवों में तो फिर भी विकास की संभावनाएं बनी रहती हैं, परंतु दूर-दराज के पिछड़े गाँवों के विकास के प्रति प्रशासन का ध्यान ही नहीं जाता। देखा जाए तो गाँवों की प्रगति से ही पूरे देश की प्रगति जुड़ी है, क्योंकि गाँवों से ही हमारी प्रत्येक आवश्यकता अनाज, वस्त्र, कागज, ईंधन, उद्योगों के लिए कच्चा माल आदि की पूर्ति होती है।


प्रश्न. संभाषणीय
आपकी तथा परिवार के किसी बड़े सदस्य की दिनचर्या की तुलना कीजिए तथा समानता एवं अंतर बताइए।
SOLUTION :
मैं दसवीं कक्षा की छात्रा हूँ और उसी स्कूल में पढ़ती हूँ, जहाँ मेरी माँ वाइस प्रिंसिपल हैं और हिंदी की प्राध्यापिका हैं। हम दोनों आठ बजे बस से स्कूल जाते हैं और दो बजे घर लौटते हैं। माँ सुबह जल्दी जगती हैं। नाश्ता और दोपहर का खाना बनाती हैं। मुझे जगाती हैं। स्वयं तैयार होती हैं। फिर हम स्कूल के लिए निकलते हैं। स्कूल से घर आकर मैं कपड़े बदलती हूँ, तब तक माँ खाना गरम करती हैं। खाना खाते समय हम दोनों स्कूल व मेरी पढ़ाई के विषय में बातें करते हैं। उसके बाद हम दोनों लगभग एक घंटा विश्राम करते हैं। चार बजे माँ फिर से काम पर लग जाती हैं।

विद्यार्थियों का गृहकार्य-कक्षाकार्य आदि जाँचना, कभी परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र बनाना और कभी परीक्षा की उत्तर-पुस्तिकाएँ जाँचना, हर दिन माँ के पास स्कूल से संबंधित काम होता ही है। मैं भी उनके पास बैठकर पढ़ती हूँ। छह-साढ़े छह बजे माँ रात के खाने की तैयारी के लिए रसोई में जाती हैं। इस बीच मैं अपनी सहेलियों के साथ कुछ देर खेलने चली जाती हूँ। आठ बजे पिता जी के आने के बाद हम तीनों खाना खाते हैं। उसके बाद मैं पढ़ती हूँ और ग्यारह बजे सो जाती हूँ।

प्रश्न. श्रवणीय
महाराष्ट्र में चलाए जाने वाले लघु उद्योगों की जानकारी रेडियो/दूरदर्शन पर सुनिए और इसके मुख्य मुद्दों को लिखिए।
SOLUTION :
महाराष्ट्र में चलाए जाने वाले लघु उद्योग और क्षेत्र:
  • कोल्हापुरी चप्पलें [कोल्हापुर]
  • वरली पेंटिंग [ठाणे]
  • लकड़ी के खिलौने [सावंतवाडी]
  • गंजीफा [सावंतवाडी]
  • चाँदी का काम [हुपरी]
  • बीदरी काम [बीदर]
  • दरी [विदर्भ]
  • बाँस का सामान [रायगड, ठाणे]
  • पीतल के संगीत वाद्य [ताल, झाँझ, घंटे]

ठेस Summary in Hindi

विषय-प्रवेश : कलाकार किसी भी धर्म, जाति और वर्ग का हो, उसे अपनी कला पर अभिमान होता है। वह स्वाभिमान के मूल्य को समझता है और उसकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहता है। जाति या धर्म के नाम पर जब उसके स्वाभिमान पर आघात होता है तो वह उसे बरदाश्त नहीं करता।

प्रस्तुत कहानी में सिरचन नामक एक ग्रामीण कलाकार का वर्णन किया गया है। वह मोथी घास और पटेर की रंगीन शीतलपाटी [चटाई], बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए पूँज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी आदि उपयोगी वस्तुएँ बनाता है। ये वस्तुएँ बनाकर वह अपनी आजीविका कमाता है। स्वाभिमानी होने के कारण वह हर परिस्थिति में अपने स्वाभिमान की रक्षा करता है।

ठेस स्वाध्याय |  ठेस स्वाध्याय pdf |  thes Swadhyay  Class 10 Hindi

जन्म ः १९२१, पूर्णिया (बिहार) 
 मृत्यु ः १९७७ 
 परिचय ः हिंदी कथाधारा का रुख बदलने वाले फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ जी को आजादी के बाद के प्रेमचंद की संज्ञा दी जाती है । आपकी कहानियों और उपन्यासों में आँचलिक जीवन की धुन, गंध, लय-ताल, सुरसुंदरता,  कुरूपता स्‍पष्‍ट रूप से दिखाई पड़ती है । आपकी भाषा-शैली में एक जादुई असर मिलता है । 
प्रमुख कृतियाँ ः ‘मैला आँचल’, ‘परती परिकथा’,‘जुलूस’(उपन्यास), ‘एक आदिम रात्रि की महक’, ‘ठुमरी’, ‘अच्छे आदमी’ (कथा संग्रह),‘ॠणजल-धनजल’, ‘नेपाली क्रांतिकथा’ (रिपोर्ताज) आदि 

ठेस स्वाध्याय |  ठेस स्वाध्याय pdf |  thes Swadhyay  Class 10 Hindi

   खेती-बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं । इसलिए खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को । क्‍या होगा, उसको बुलाकर ? दूसरे मजदूर खेत पहुँचकर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता हुआ दिखाई पड़ेगा; पगडंडी पर तौल-तौलकर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे । मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है । आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई । एक समय था, जब उसकी मड़ैया के पास बाबू लोगों की सवारियाँ बँधी रहती थीं  । 

उसे लोग पूछते ही नहीं थे,उसकी खुशामद भी करते थे । ‘‘अरे, सिरचन भाई ! अब तो तुम्‍हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके में । एक दिन का समय निकालकर चलो । बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से-सिरचन से एक जोड़ा चिक बनाकर भेज दो ।’’ मुझे याद है.. मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, ‘‘भोग क्‍या-क्‍या लगेगा ?’’ माँ हँसकर कहतीं, ‘‘जा-जा बेचारा मेरे काम में पूजा-भोग की बात नहीं उठाता कभी ।’’ पड़ोसी गाँव के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने -‘‘तुम्‍हारी भाभी नाखून से खाँटकर तरकारी परोसती है और इमली का रस डालकर कढ़ी तो हम मामूली लोगों की घरवालियाँ बनाती हैं ।

 तुम्‍हारी भाभी ने कहाँ से बनाना सीखी हैं!’’ इसलिए सिरचन को बुलाने के पहले मैं माँ से पूछ लेता ...। सिरचन को देखते ही माँ हुलसकर कहती, ‘‘आओ सिरचन ! आज नेनू मथ रही थी तो तुम्‍हारी याद आई । घी की खखोरन के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न... ! और बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी की शीतलपाटी के लिए ।’’ सिरचन अपनी पनियायी जीभ को सँभालकर हँसता-‘‘घी की सोंधी सुगंध सूँघकर ही आ रहा हूँ, काकी ! नहीं तो इस शादी-ब्‍याह के मौसम में दम मारने की भी छुट्टी कहाँ मिलती है ?’’

सिरचन जाति का कारीगर है । मैंने घंटों बैठकर उसके काम करने के ढंग को देखा है । एक-एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जतन से उसकी कुच्ची बनाता । फिर कुच्चियों को रँगने से लेकर सुतली सुलझाने मंे पूरा दिन समाप्त ।... काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेहुँअन साँप की तरह फुफकार उठता-‘‘फिर किसी दूसरे से करवा लीजिए काम ! सिरचन मँुहजोर है, कामचोर नहीं ।’’ बिना मजदूरी के पेट भर भात पर काम करने वाला कारीगर ! दूध में कोई मिठाई न मिले तो कोई बात नहीं किंतु बात में जरा भी झाला वह नहीं बरदाश्त कर सकता। सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं । तली बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाईवाला दूध, इन सबका प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ; दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा । खाने-पीने में चिकनाई की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्‍म ! 

काम अधूरा रखकर उठ खड़ा होगा-‘‘आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है । थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आकर पूरा कर दूँगा ।’’ ‘किसी दिन’ माने कभी नहीं! मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूँज की रस्‍सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्‍तों की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत-से काम हैं जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता । यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग । बेकाम का काम जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरूरत नहीं । पेट भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना-धुराना कपड़ा देकर विदा करो ।

 वह कुछ भी नहीं बोलेगा।... कुछ भी नहीं बोलेगा; ऐसी बात नहीं, सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं, सिरचन बात करने में भी कारगर है ।... महाजन टोले के भज्‍जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुनकर तिलमिला उठी थी-‘‘ठहरो ! मैं माँ से जाकर कहती हूँ । इतनी बड़ी बात !’’ ‘‘बड़ी बात ही है बिटिया ! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है । नहीं तो दो-तीन पटेर की पाटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्‍तू खिलाकर कोई करवाए भला ? यह तुम्‍हारी माँ ही कर सकती है बबुनी !’’ सिरचन ने मुस्‍कराकर जवाब दिया था । इस बार मेरी सबसे छोटी बहन पहली बार ससुराल जा रही थी । मानू के दूल्‍हे ने पहले ही बड़ी भ‍ाभी को लिखकर चेतावनी दे दी है-‘‘मानू के  साथ मिठाई की पतीली न आए, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों के बिना आएगी मानू तो ... !’’ 

भाभी ने हँसकर कहा, ‘‘बैरंग वापस !’’ इसलिए, एक सप्ताह पहले से ही सिरचन को बुलाकर काम पर तैनात करवा दिया था। माँ ने-‘‘देखाे सिरचन ! इस बार नई धोती दूँगी; असली मोहर छापवाली धोती। मन लगाकर ऐसा काम करो कि देखने वाले देखते ही रह जाएँ ।’’ पान-जैसी पतली छुरी से बाँस की तीलियाँ और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया । रंगीन सुतलियों में झब्‍बे डालकर वह चिक बुनने बैठा । डेढ़ हाथ की बिनाई देखकर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नये फैशन की चीज बन रही है । मँझली भाभी से नहीं रहा गया । परदे की आड़ से बोली, ‘‘पहले ऐसा जानती कि मोहर छापवाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती ।’’ 

काम में व्यस्‍त सिरचन के कानों मंे बात पड़ गई । बोला, ‘‘मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया । मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है... मानू दीदी का दूल्‍हा अफसर आदमी है !’’ मँझली भाभी का मुँह लटक गया । मेरी चाची ने फुस-फुसाकर कहा, ‘‘किससे बात करती है बहू ? मोहर छापवाली धोती नहीं, मुँगिया लड्डू । बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी । देखती है न!’’ दूसरे दिन चिक की पहली पाँति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा ! अपने काम में मगन सिरचन को खाने-पीने की सुध नहीं रहती । 

चिक में सुतली के फंदे डालकर उसने पास पड़े सूप पर निगाह डाली-चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला । मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएँ उभर आईं । मैं दौड़कर माँ के पास गया । ‘‘माँ, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़ ?’’ माँ रसोईघर के अंदर पकवान आदि बनाने में व्यस्‍त थी । बोली, ‘‘अरी मँझली, सिरचन को बुँदिया क्‍यों नहीं देती ?’’ ‘‘बुँदिया मैं नहीं खाता, काकी !’’ सिरचन के मुँह में चिउरा भरा हुअा था । गुड़ का ढेला सूप में एक किनारे पर पड़ा रहा, अछूता । माँ की बोली सुनते ही मँझली भाभी की भौंहें तन गईं । मुट्ठी भर बुँदिया सूप में फेंककर चली गई । सिरचन ने पानी पीकर कहा, ‘‘मँझली बहुरानी अपने मैके से आई हुईं मिठाई भी इसी तरह हाथ खोलकर बाँटती हैं क्‍या ?’’ बस, मँझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी । चाची ने माँ के पास जाकर कहा- ‘‘मॅुंह लगाने से सिर पर चढ़ेगा ही ।... किसी के नैहर-ससुराल की बात क्‍यों करेगा वह ?’’ 

मँझली भाभी माँ की दुलारी बहू है । माँ तमककर बाहर आई-‘‘सिरचन, तुम काम करने आए हो, अपना काम करो । बहुओं से बतकुट्‌टी करने की क्‍या जरूरत ? जिस चीज की जरूरत हो, मुझसे कहो।’’ सिरचन का मुँह लाल हो गया । उसने कोई जवाब नहीं दिया । बाँस में टँगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा । मानू पान सजाकर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को देती हुई इधर-उधर देखकर बोली ‘‘सिरचन दादा, काम-काज का घर ! पाँच तरह के लोग पाँच किस्‍म की बात करेंगे । तुम किसी की बात पर कान मत दो ।’’ सिरचन ने मुस्‍कराकर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया । चाची अपने कमरे से निकल रही थी । सिरचन को पान खाते देखकर अवाक हो गई । सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देखकर कहा, ‘‘छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा खिलाना। बहुत दिन हुए ...।’’ 

चाची कई कारणों से जली-भुनी रहती थी सिरचन से । गुस्‍सा उतारने का ऐसा मौका फिर नहीं मिल सकता । झनकती हुई बोली, ‘‘तुम्‍हारी बढ़ी हुई जीभ में आग लगे । घर में भी पान और गमकौआ जर्दाखाते हो ?... चटोर कहीं के !’’ मेरा कलेजा धड़क उठा... हो गया सत्‍यानाश ! बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए । मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुँह में घुलाता रहा फिर अचानक उठकर पिछवाड़े पीक थूक आया । अपनी छुरी, हँसिया वगैरह समेट-सँभालकर झोले में रखे । टँगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आँगन से बाहर निकल गया। मानू कुछ नहीं बोली । चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही ।... सातों तारे मंद पड़ गए । माँ बोलीं, ‘‘जाने दे बेटी ! जी छोटा मत कर मानू! मेले से खरीदकर भेज दूँगी ।’’ मैं सिरचन को मनाने गया । देखा, एक फटी हुई शीतलपाटी पर लेटकर वह कुछ सोच रहा है । मुझे देखते ही बोला, ‘‘बबुआ जी ! अब नहीं । कान पकड़ता हूँ, अब नहीं ।... मोहर छापवाली धोती लेकर क्‍या करूँगा । कौन पहनेगा ?... ससुरी खुद मरी, बेटे-बेटियाें को ले गई अपने साथ । बबुआ जी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता ? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है । इस शीतलपाटी को छूकर कहता ह

अब यह काम नहीं करूॅंगा ।... गाँव भर में तुम्‍हारी हवेली में मेरी कदर होती थी । अब क्‍या ?’’ मैं चुपचाप वापस लौट आया । समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है । वह नहीं आ सकता। बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट का झालर लगाने लगी-‘‘यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्‍यों मानू ?’’ मानू कुछ नहीं बोली ।... बेचारी ! किंतु मैं चुप नहीं रह सका-‘‘चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमेंभी !’’ मानू काे ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था । स्‍टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जतन से अधूरी चिक को मोड़कर लिए जा रही है अपने साथ । मन-ही-मन सिरचन पर गुस्‍सा हो आया । चाची के सुर-में-सुर मिलाकर कोसने को जी हुआ-‘कामचोर, चटोर !’ गाड़ी आई । 

सामान चढ़ाकर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफाॅर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी-‘‘बबुआ जी !’’ उसने दरवाजे के पास आकर पुकारा । ‘‘क्‍या है ?’’ मैंने खिड़की से गरदन निकालकर झिड़की के स्‍वर में कहा । सिरचन ने पीठ पर लदे हुए बोझ को उतारकर मेरी ओर देखा-‘‘दौड़ता आया हूँ !... दरवाजा खोलिए ! मानू दीदी कहाँ हैं ? एक बार देखूँ ।’’ मैंने दरवाजा खोल दिया । ‘‘सिरचन दादा !’’ मानू इतना ही बोल सकी । खिड़की के पास खड़े होकर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, ‘‘यह मेरी ओर से है । सब चीजें हैं दीदी ! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी कुश की ।’’ गाड़ी चल पड़ी । मानू मोहर छापवाली धोती का दाम निकालकर देने लगी । सिरचन ने जीभ को दाँत से काटकर, दोनों हाथ जोड़ दिए । मानू फूट-फूटकर रो रही थी । मैं बंडल को खोलकर देखने लगा- ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों का ऐसा काम, पहली बार देख रहा था । (‘फणीश्वरनाथ रेणु की संपूर्ण कहानियाँ’ से)

ठेस स्वाध्याय |  ठेस स्वाध्याय pdf |  thes Swadhyay  Class 10 Hindi

Balbharti Maharashtra State Board Class 10 Hindi Solutions Lokbharti Chapter 10 ठेस Notes, Textbook Exercise Important Questions and Answers.

Maharashtra State Board Class 10 Hindi Lokbharti Chapter 10 ठेस
Hindi Lokbharti 10th Std Digest Chapter 10 ठेस Textbook Questions and Answers

कृतिपत्रिका के प्रश्न 1 [अ] तथा प्रश्न 1 [आ] के लिए।

अनुक्रमणिका  INDIEX

Maharashtra State Board 10th Std Hindi Lokbharti Textbook Solutions
Chapter 1 भारत महिमा
Chapter 2 लक्ष्मी
Chapter 3 वाह रे! हम दर्द
Chapter 4 मन (पूरक पठन)
Chapter 5 गोवा : जैसा मैंने देखा
Chapter 6 गिरिधर नागर
Chapter 7 खुला आकाश (पूरक पठन)
Chapter 8 गजल
Chapter 9 रीढ़ की हड्डी
Chapter 10 ठेस (पूरक पठन)
Chapter 11 कृषक गान

Hindi Lokbharti 10th Textbook Solutions दूसरी इकाई

Chapter 1 बरषहिं जलद
Chapter 2 दो लघुकथाएँ (पूरक पठन)
Chapter 3 श्रम साधना
Chapter 4 छापा
Chapter 5 ईमानदारी की प्रतिमूर्ति
Chapter 6 हम उस धरती की संतति हैं (पूरक पठन)
Chapter 7 महिला आश्रम
Chapter 8 अपनी गंध नहीं बेचूँगा
Chapter 9 जब तक जिंदा रहूँ, लिखता रहूँ
Chapter 10 बूढ़ी काकी (पूरक पऊन)
Chapter 11 समता की ओर
पत्रलेखन (उपयोजित लेखन)
गद्‍य आकलन (उपयोजित लेखन)
वृत्तांत लेखन (उपयोजित लेखन)

कहानी लेखन (उपयोजित लेखन)
विज्ञापन लेखन (उपयोजित लेखन)
निबंध लेखन (उपयोजित लेखन)

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